यादों का कोहरा

डॉ सुलक्षणा अहलावत

रचनाकार- डॉ सुलक्षणा अहलावत

विधा- गज़ल/गीतिका

यादों के कोहरे ने ढ़क लिया बेवफाई का आसमान,
मुझसे ही दगा कर रहा है देखो ये मेरा दिल बेईमान।

आज भी धड़कनें तेज़ हो जाती हैं तेरे नाम से मेरी,
यकीन करोगी नहीं पर तुझमें अटकी हुई है ये जान।

बेवफाई तुमने की इल्जाम मुझे दिया मैं खामोश था,
क्यों रहा खामोश मैं, जानकर तुम बनी रही अनजान।

कयामत की रात थी वो जब पलकें भी नहीं झपकी,
आँसू गिरते रहे तकिये पर, दिल बन गया था श्मशान।

पत्थर कहकर चली गयी तुम जिंदगी से मेरी उस दिन,
पर भूल गयी कभी मिटते नहीं पत्थर पर पड़े निशान।

सच कहूं तेरे दिए जख्मों को मैंने कभी भरने नहीं दिया,
कहीं फिर से मोहब्बत ना कर बैठे मेरा दिल ऐ नादान।

छोड़कर मुझे जलाकर निशानी खुश नहीं रही होगी तुम,
कुछ पल के लिए ही सही बना था तेरे दिल का मेहमान।

सुनो मेरे दिल के दरवाजे आज भी खुले हैं तुम्हारे लिए,
पर आओ तो ऐसे आना पूरी हो ये मोहब्बत की दास्तान।

देखना एक दिन सुलक्षणा लिखेगी गीत अपने मिलन के,
कलम उसकी दिलवाएगी हमें भी हीर राँझे जैसी पहचान।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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डॉ सुलक्षणा अहलावत
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लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की खुशबु आये। शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हूँ। हरियाणवी लोक गायक श्री रणबीर सिंह बड़वासनी मेरे गुरु हैं। माँ सरस्वती की दयादृष्टि से लेखन में गहन रूचि है।
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