यह नगरी है (४)

ईश्वर दयाल गोस्वामी

रचनाकार- ईश्वर दयाल गोस्वामी

विधा- कविता

यह नगरी है ,
भक्तों की , परम विरक्तों की ।
बगुले जैसा ध्यान लगाते​ ।
फिर भी मछली पकड़ न पाते ।
यज्ञ कराते भजन कराते ।
रामायण का पाठ कराते ।
हज़ करते रोजा रखते हैं ।
व्रत रखते कीर्तन गाते है ।
थोड़ी-बहुत मदद भी करते ।
उसका सब पर रौब़ जमाते ।
यद्यपि अकर्मण्य हैं यह सब ,
फिर भी कर्मवीर कहलाते ।
केवल शोषण ही करते हैं ,
फिर भी ये पोषक कहलाते ।
परधन की ही बाट जोहते ,
स्त्रियों के आसक्तों की ।
यह नगरी है ,
भक्तों की परम विरक्तों की ।

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ईश्वर दयाल गोस्वामी
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-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02 - 1971 जन्म-स्थान - रहली स्थायी पता- ग्राम पोस्ट-छिरारी,तहसील-. रहली जिला-सागर (मध्य-प्रदेश) पिन-कोड- 470-227 मोवा.नंबर-08463884927 हिन्दीबुंदेली मे गत 25वर्ष से काव्य रचना । कविताएँ समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित । रुचियाँ-काव्य रचना,अभिनय,चित्रकला । पुरस्कार - समकालीन कविता के लिए राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल द्वारा 2013 में राज्य स्तरीय पुरस्कार । नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली द्वारा रमेशदत्त दुबे युवा कवि सम्मान 2015 ।
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