यह नगरी है (३)

ईश्वर दयाल गोस्वामी

रचनाकार- ईश्वर दयाल गोस्वामी

विधा- कविता

यह नगरी है ,
संतों की , परम महंतों की ।
जटा-जूट लम्बे-चौड़े हैं ।
पर विचार इनके भौंड़े हैं ।
तिलक है लम्बा चिंतन छोटा ।
धर्म-कर्म सब इनका खोटा ।
यज्ञ कराते चन्दा लेते ।
बदले में फिर राख बेचते ।
ब्रह्मचर्य का झांसा देकर ,
महिलाएं आकर्षित करते ।
डींग हांकना इनका पेशा ,
केशरिया इनका बाना है ।
हम समाज के उद्धारक हैं ,
ऐंसा ही इनका नारा है ।
ये जो कहते वहीं सत्य है ।
बाकी दुनियां​ सब असत्य है ।
शून्य से आगे जिनकी गणना ,
ऐसे परम अनंतों की ।
यह नगरी है ,
संतों की , परम महंतों की ।

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ईश्वर दयाल गोस्वामी
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-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02 - 1971 जन्म-स्थान - रहली स्थायी पता- ग्राम पोस्ट-छिरारी,तहसील-. रहली जिला-सागर (मध्य-प्रदेश) पिन-कोड- 470-227 मोवा.नंबर-08463884927 हिन्दीबुंदेली मे गत 25वर्ष से काव्य रचना । कविताएँ समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित । रुचियाँ-काव्य रचना,अभिनय,चित्रकला । पुरस्कार - समकालीन कविता के लिए राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल द्वारा 2013 में राज्य स्तरीय पुरस्कार । नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली द्वारा रमेशदत्त दुबे युवा कवि सम्मान 2015 ।

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