यह नगरी है (२)

ईश्वर दयाल गोस्वामी

रचनाकार- ईश्वर दयाल गोस्वामी

विधा- कविता

यह नगरी है ,
सिद्धों की, परम प्रसिद्धों की ।
कान खड़े रहते हैं जिनके ,
परनिंदा हरक्षण सुनने को ।
नाक सदा जो पेंनी रखते ,
गंध घृणा की ही लेने को ।
मुंह भी लम्बा-चौड़ा करते ,
धर्म-कर्म की डींग हांकने​ ।
आंखें सदा टिकाए रहते ,
परस्त्री की देह ताकने ।
सूखकर ज्यों डाल गिरी रूख से ।
आदमी ज्यों मर गया हो भूख से ।
उसके मरण-भोज की
आस में बैठे हुए कुछ ,
चीलों , कौओं , गिद्धों की ।
यह नगरी है ,
सिद्धों की , परम प्रसिद्धों की ।

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ईश्वर दयाल गोस्वामी
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-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02 - 1971 जन्म-स्थान - रहली स्थायी पता- ग्राम पोस्ट-छिरारी,तहसील-. रहली जिला-सागर (मध्य-प्रदेश) पिन-कोड- 470-227 मोवा.नंबर-08463884927 हिन्दीबुंदेली मे गत 25वर्ष से काव्य रचना । कविताएँ समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित । रुचियाँ-काव्य रचना,अभिनय,चित्रकला । पुरस्कार - समकालीन कविता के लिए राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल द्वारा 2013 में राज्य स्तरीय पुरस्कार । नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली द्वारा रमेशदत्त दुबे युवा कवि सम्मान 2015 ।

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