मैं हूँ एक फूल सुर्ख गुलाब

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

🌹🌹🌹🌹🌹🌹
मैं हूँ एक फूल सुर्ख गुलाब।
जिधर से भी मैं गुजरूँ,
छोड़ जाऊँ खुश्बू बेहिसाब।
🌹🌹
मेरा जीवन काँटों की चुभन,
चेहरा खिला मुस्कुराता गुलाब।
मेरे अंग-अंग में सुन्दरता,
तन में कोमलता नाजुक-सी गुलाब।
मैं हूँ….
🌹🌹
मेरी चेहरे की सादगी जैसे,
सुबह की खिली ताजी सफेद गुलाब।
ओस की बूंद से भींगे लब जैसे,
हो दो पंखुड़ियाँ गुलाबी गुलाब।
मैं हूँ……
🌹🌹
मेरी बातें गुलाब की खुश्बू,
गाल दहके सुर्ख लाल गुलाब।
मेरे नीले नशीले दो नयन जैसे,
हो दो नीला – नीला गुलाब।
मैं हूँ……
🌹🌹
मेरे काले से घने बाल जैसे,
हो हरा-हरा और काला गुलाब।
अपने दुश्मनों से भी मिलती हूँ,
मैं हाथ में लेकर एक पीला गुलाब।
मैं हूँ…..
🌹🌹
मैं हूँ एक फूल सुर्ख गुलाब,
जिधर से भी मैं गुजरूँ,
छोड़ जाऊँ खुश्बू बेहिसाब।
🌹🌹🌹🌹—लक्ष्मी सिंह 💓☺

बेहतरीन साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ आपके लिए- यहाँ क्लिक करें

Views 135
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
लक्ष्मी सिंह
Posts 173
Total Views 79.4k
MA B Ed (sanskrit) please visit my blog lakshmisingh.blogspot.com( Darpan) This is my collection of poems and stories. Thank you for your support.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia