“मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ”

kumari archana

रचनाकार- kumari archana

विधा- कविता

मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ
मैं बाबुल की न्यारी
मैया की दुलारी
भैया की राजदुलारी
बहना की सखी
बेटी हूँ ….

जैसे बिन आंगन के
घर घर नहीं केवल कमरा होता
वैसे जिस घर में बेटी नहीं होती
वह परिवार कभी भी पूरा नहीं होता
इसलिए मेरी शादी के बाद
आंगन सूना हो जाता…

भले ही शादी के बाद
मैं पराई हो जाती
पर मायका का
खुला दरवाजे व खिलाडियाँ
हर वक्त मेरा रास्ते देखते
वैसे भैया व बहना मुझसे
मिलने को तरसते
मैया और बाबुल मुझसे मिलने का
खुली आँखों से सपना संजोते
दिल से मुझे खुश रहने का
सदा आशिष देते. …
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ बिहार
23 / 1 / 17
मौलिक और अप्रकाशित रचना

Views 30
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
kumari archana
Posts 2
Total Views 180
कुमारी अर्चना जिला-पूर्णियाँ,बिहार विधा-छंदमुक्त, रस-श्रृंगार,करूण, मैं कविता,क्षणिकाएँ,दोहा,मुक्तक,हाईकु,गीत लिखती हूँ, "मेरी कविता मेरी कल्पना मात्र नहीं,यह मेरे हृदय से निकली भावना है,जो मेरी आत्मा तक को छूती है" ! मेरी अब तक विभिन्न पत्र व पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है,मेरी कई साझा काव्य संग्रह जल्दी आने वाली है !

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia