“मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ”

kumari archana

रचनाकार- kumari archana

विधा- कविता

मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ
मैं बाबुल की न्यारी
मैया की राजदुलारी
बहना की सखी
बेटी हूँ…
घर घर नहीं केवल कमरा होता
वैसे जिस घर में बेटी नहीं होती
वह परिवार भी कभी
पूरा नहीं होता….

इसलिए मेरी शादी के बाद
आंगन सूना सा हो जाता
भले शादी के बाद मैं पराई हो जाती
पर मायका का खुला दरवाजे व खिडकियाँ
हर वक्त मेरा रास्ते देखते. ..

वैसे भैया व बहना मुझसे मिलने को तरसते
मैया और बाबुल मुझसे मिलने का
खुली आँखों से सपना संजोते
दिल से मुझे खुश रहने का सदा आशिष देते. .
मैं बेटी घर की आंगन जैसी हूँ. ….
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ बिहार
23 / 1 / 17
मौलिक और अप्रकाशित रचना

Views 147
Sponsored
Author
kumari archana
Posts 2
Total Views 172
कुमारी अर्चना जिला-पूर्णियाँ,बिहार विधा-छंदमुक्त, रस-श्रृंगार,करूण, मैं कविता,क्षणिकाएँ,दोहा,मुक्तक,हाईकु,गीत लिखती हूँ, "मेरी कविता मेरी कल्पना मात्र नहीं,यह मेरे हृदय से निकली भावना है,जो मेरी आत्मा तक को छूती है" ! मेरी अब तक विभिन्न पत्र व पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है,मेरी कई साझा काव्य संग्रह जल्दी आने वाली है !
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia