मेरे शब्द/मंदीप

Mandeep Kumar

रचनाकार- Mandeep Kumar

विधा- गज़ल/गीतिका

मेरे शब्द/मंदीप

मेरे शब्द मेरी पहचान बताते,
मेरे ही शब्द मेरा लोगो से परिचय करवाते।

है कितना घाव इस दिल में,
मेरे ही शब्द मेरे दिल का हाल बताते।

गिरते है जब भी आँखों से मेरे आँसु,
मेरे ही आँसू बिना बोले शब्द बन जाते।

रहता हूँ जब भी मै तन्हाइयो में,
मेरे ही शब्द मुझे गले से लगते है।

बोलता हूँ जब भी मे ऊँची आवाज में,
मेरे ही शब्द मुझे नीचा दिखाते है।

रूठता है जब भी कोई अपना,
मेरे ही शब्द उसे प्यार से मनाते।

है मेरे शब्दों की अमियत इतनी,
दुश्मन भी मुझे गले से लगाते।

कितना दूर रहा हु में सनम तुझ से
मेरे हर शब्द उस पल का अहसास करवाते।

है कोई "मंदीप" के दिल में कोई
आज कल मुझे उस के शब्द ही बहाते।

मंदीपसाई

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Mandeep Kumar
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नाम-मंदीप कुमार जन्म-10/2/1993 रूचि-लिखने और पढ़ाने में रूचि है। sirmandeepkumarsingh@gmail.com Twitter-@sirmandeepkuma2 हर बार अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ। और रही बात हम तो अपना दर्द लिखते है।मेरा समदिल मेरे से खुश है तो मेरी रचना उस के दिल का बखान करेगी।और जब वो रूठता है तो मै मेरे दिल का बखान करूँगा।हा पर बहुत अच्छा है वो और मेरे दिल में उस के लिए खास ही जगह है ।जहाँ तक कोई पहुँच भी नही पायेगा। मेरा दिल जरूर दुःखता है पर मेरा दिल उसे बार बार माफ़ कर देता है।

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