*** मेरे पसंदीदा शेर ***

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- शेर

मैं मशगूल था अपने ही ख्यालों में

कब मशहूर हो गया क्या पता ।।

👍मधुप बैरागी

जख़्म भरे जाते नहीं ज़ाम-ए-शराब से

नासूर बन जाते हैं ये तल्ख़-ए-जिंदगी ।।
👍मधुप बैरागी

क्यों दीवारे तन्हाई खड़ी है हम दोनों के बीच

हम तो नहीं हुए थे तुमसे ख़फा कभी ।।
👍मधुप बैरागी

मिल के अश्कों को यूं बहालें हम

तन्हाई में फिर रोना ना पड़े हमको ।।

👍मधुप बैरागी

आज कह दो गिले-शिकवे सब हमसे

वरना शिकायते मुहब्बत ना करना कभी ।।
👍मधुप बैरागी

जितना जी चाहे प्यार कर लो मुझसे

फिर तन्हाई में याद रह जायेगी मेरी ।।

👍मधुप बैरागी

कलम चलती रहे मेरी रुक ना जाये कहीँ

जिंदगी यूं ही चलती रहे चूक ना हो जाये कहीँ ।।
👍मधुप बैरागी

जीना चाहा था मगर जिंदगी ना मिली

मौत भी अब हमसे अपना दामन छुड़ा के चली ।।
👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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