मेरी सहेली

विक्रम साही

रचनाकार- विक्रम साही

विधा- कविता

जिस पिता के संग मे खेली,

जिस ने बना कर रखा था अपनी सहेली,

उस पिता ने ही विदा कर दी मेरी डोली,

आँसुओ की खेली होली,

जीवन एक पहेली !, जीवन एक पहेली !

मेरे आने पर जिस पिता ने मनाई,

होली और दीवाली,

आज, उस पिता ने ही मेहंदी लगा  कर ,

छोड़ दी मेरी हथेली

जीवन एक पहेली !, जीवन एक पहेली !

अब इस दुनिया के रंगो से,  

रंग गयी हे मेरी जीवन शेली,

जीवन बन गया हे अब एक पहेली,

भूल गयी मे भी अपनी सहेली,

जीवन एक पहेली !, जीवन एक पहेली !

अभी कल ही तो आई थी मेरे जीवन मे खुशाली ,

मेरी बेटी की हर बात थी नीराली ,

वह गुडियो के संग खेली,

और मेने गुड़िया को बना लिया अपनी सहेली,

जीवन बन गया एक पहेली,

पर  भूल ना पाया मे अपनी सहेली

जीवन एक पहेली !, जीवन एक पहेली !

यह एहेसास  था मुझको,

की एक दिन चली जाएगी मेरी सहेली

और छूट जाएगी मेरे हाथो से उसकी हथेली,

पूर अब भी सुलझा ना पाया हू यह पहेली,

क्यो चले गयी मेरी सहेली

जीवन एक पहेली !, जीवन एक पहेली !

अब मे अकेला हू,

तेरी यादो का लिए रेला हू

डुंडता हू नीशान जहा पर तू खेली,

तेरी हर बात थी , मेरे लिए एक पहेली

बारिश की बूँदो से चंचल थी मेरी सहेली

पर अब बदल गयी उसकी जीवन शेली,

जीवन एक पहेली !, जीवन एक पहेली

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विक्रम साही
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जम्मू-विश्वविद्यालय

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