मेरी माँ मुझे कितना याद आती है

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

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मत पूछो मुझसे कि,
मेरी माँ मुझे कितना याद आती है।
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पलकें बंद करूँ तो,
सामने साक्षात माँ मुस्कुराती है।
माथे पर बड़ी-सी बिंदी,
कानों में सोने की बाली,
चूड़ियाँ भरी हाथों से
मेरे सर को सहलाती है।
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मत पूछो मुझसे कि,
मेरी माँ मुझे कितना याद आती है।
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हर तकलीफ में,हर आह में,
होठों पर सिर्फ माँ की नाम आती है।
कांटे भरी इस जीवन में,
माँ फूल बन के बरस जाती है।
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मत पूछो मुझसे कि,
मेरी माँ मुझे कितना याद आती है।
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रसोईघर की हर रोटी में,
माँ की हाथों की स्वाद याद आती है।
जब मैं सुलाती हूँ बच्चों को,
मेरी लोरी में माँ गुनगुनाती है
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मत पूछो मुझसे कि,
मेरी माँ मुझे कितना याद आती है।
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मेरे हर काम में,मेरे व्यवहार में,
मेरे अहसास में माँ ही माँ समाई है।
कहने को तो दूर हूँ उनसे,
पर हर घड़ी,हरपल माँ साथ रहती है।
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मत पूछो मुझसे कि,
मेरी माँ मुझे कितना याद आती है।
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मेरे रगों में जो खून बहता है,
खून के हर बूँद में माँ समाई है।
मेरा चेहरा है आईना,
मुझ में माँ की परछाई है।
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मत पूछो मुझसे कि,
मेरी माँ मुझे कितना याद आती है।
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मैं कैसे कहूँ कि,
माँ मुझको कितना याद आती है।
मेरी माँ मुझे
बहुत – बहुत याद आती है।
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मत पूछो मुझसे कि,
मेरी माँ मुझे कितना याद आती है।
🌹🌹🌹🌹—लक्ष्मी सिंह 💓😊

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लक्ष्मी सिंह
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