मेरी बेटी—मेरीदुनिया

Rajshree Gaur

रचनाकार- Rajshree Gaur

विधा- कविता

मेरी बेटी—मेरी दुनिया
तुम कल भी मेरी दुनिया थी,
तुम आज भी मेरी दुनिया हो।

जब जन्मी तुम मेरे आँगन में,
मेरा सूना जीवन चहक उठा ।
तेरी बाल- सुलभ क्रीड़ाओं से,
मेरा मन उपवन फिर महक उठा।
इस बगिया की सोन चिरैया हो।
तुम कल भी ………
तुम आज भी………..

तुम बड़ी हुई, परिणीता हुई,
निज शिशु की ममता से बँधी।
घर, ससुराल सजाया तुमने,
बिसरा कर अपनी ही सुधी।
पर डैड़ी की आज भी मुनिया हो।
तुम कल भी……….
तुम आज भी………..

सूरज की प्रख़र किरण हो तुम,
कभी चन्दा की शीतलता हो।
कभी बूँद स्वाति,कभी अमृत-घट,
जीवन देती हो सबको, तुम
शरद्-पूर्णिम-चंद्र किरणिया हो।
तुम………
तुम आज………

तन-मन बिसरा कर के तुम,
निज दायित्व निभाती हो।
स्व-श्रम से सपने निज के,
तुम पूर्ण करती जाती हो।
डैड़ी की सुघड़ सुगुनिया हो।
तुम कल भी…….
तुम आज………..
——-राजश्री—–

Views 1,035
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Rajshree Gaur
Posts 15
Total Views 1.1k
लेखिका राजश्री गौड़ बीए बीएड़ जन्मतिथी24-11-56. पिता --श्रीभीमसेन पराशर माता -श्रीमति जयदेवी पराशर साहित्यिक सम्मान--नारीगौरव,भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ , प्रेम काव्य सागर , काव्यश्री सम्मान।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia