मेरा हक, उन्हीं के कुत्ते खाते है।

पारसमणि अग्रवाल

रचनाकार- पारसमणि अग्रवाल

विधा- अन्य

अब वो हर रोज दीवाली मनाते है।
अच्छे दिन नस्ल पहचान कर आते है।
मोहताज है जो दो वक्त की रोटी को,
अपने हिस्से में दुःख ही दुःख पाते है।
अट्टू विश्वास है जिन पर,
मेरा हक, उन्हीं के कुत्ते खाते है।
वादा किया था गरीबी मिटाने का,
गरीबो को मिटाने का हुनर दिखाते है।

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