मेरा साथ निभाना तुम

सौरभ कुमार प्रजापति

रचनाकार- सौरभ कुमार प्रजापति

विधा- अन्य

💐मैं बसंत हूँ,मेरी बहार बन जाना तुम।
मैं सूरज बनूँ तुम्हारा,मेरी किरण बन जाना तुम।
बन के मेरे जीवनसाथी मेरा साथ निभाना तुम।
जब लडख़ड़ाहूँ मैं ठोकर खाकर,बाँहों में अपनी थामना तुम।
बन के मेरे पथप्रदर्शक मेरे,मुझको रह दिखाना तुम।
बन के मेरे जीवनसाथी मेरा साथ निभाना तुम।
ओढ़ के चुनार लाज शर्म की,मांग में टीका सजाना तुम।
चूड़ी बिंदी लाली काजल से,सजना और सवरना तुम।
रुन छून रून छून पहन के पायल,मेरे घर आ जाना तुम।
फिर हो काट मेरी सिर्फ मेरी,सब को भूल जाना तुम।
ऐसे ही हर जन्म में,मेरी बनके आना तुम।
बन के मेरे जीवनसाथी मेरा साथ निभाना तुम।
सुबह सुबह गीले बालों को,झटक के मुझको उठाना तुम।
चुम के मेरे माथे को,कान में गुड मॉर्निंग कह जाना तुम।
जब पकड़ू मैं हाथ तुम्हारा चल गंदे कह कर हाथ छुड़ाना तुम।
जब जाऊं मैं घर से बाहर,तो खिड़की से हाथ हिलाना तुम।
शाम को थक के आऊ घर पर तो,मेरे सर को सहलाना तुम।
रात को मेरे साथ में तुम भी,प्यारे सपनों में खो जाना तुम।
बन के मेरे जीवनसाथी मेरा साथ निभाना तुम।।
यु ही कभी कभी नकली सा,मुझसे रुठ जाना तुम।
मैं मनाऊंगा तुम को तो,झट से मान जाना तुम।
अगर मैं रुठ तो ऐसे ही,मुझको भी रिझाना तुम।
अगर उस मुस्कान से,मेरा गम मिटाना तुम।
आये कोई मुसीबत चाहे,मेरी हिम्मत बन जाना तुम।
गुजर जायेगी हर रात अँधेरी,ये बोल के हौसला बढ़ाना तुम।
बन के मेरे जीवनसाथी मेरा साथ निभाना तुम।💐

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