मेरा वेलेंटाइन ज्ञान

अजय कुमार मिश्र

रचनाकार- अजय कुमार मिश्र

विधा- लेख

आजकल एक वीक चल रहा है , जिसका समापन एक विशेष डे से होगा। रोज कोई न कोई डे का पता चल रहा है । इससे बहुत ज्ञानवर्धन भी हो रहा है । वैसे पहले ज्ञान किसी गुरु या पुस्तक के माध्यम से प्राप्त होता था , लेकिन अब Facebook गुरु और बुक दोनों हो गया है । यहाँ जो ज्ञान गंगा प्रवाहित होती है , वो अन्यत्र दुर्लभ है।पुस्तक से केवल अपने सांस्कृतिक परिवेश का ही ज्ञान होता था , लेकिन अब विभिन्न परिवेश और संस्कृतियों का ज्ञान प्राप्त होता रहता है।
लेकिन आजकल जो डेज़ चल रहे हैं , इनके नाम तक से प्रारम्भिक जीवन के लम्बे काल खंड तक अनजान था। अनजान रहता भी तो क्यूँ नहीं – एक तो पूर्वांचल के पिछड़े ज़िले में बचपन बीता था। वैसे सूर्योदय तो पूरब में पहले होता है , लेकिन ज्ञान का प्रकाश पश्चिम से ही पूरब की ओर आता है । लेकिन तब तक ये प्रकाश वहाँ तक पहुँचा नहीं था। दूसरी बात मेरी प्रारम्भिक शिक्षा संस्कार भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर में हुई थी। अब संस्कार भारती द्वारा संचालित विद्यालय में शिक्षा प्राप्त हुई हो , तब ऐसे डेज़ का ज्ञान तो होना भी नहीं था। हिंदी माध्यम से पढ़ाई होने के कारण अंग्रेज़ी से भी दूर थे। अब अंग्रेज़ी ही दूर थी , तो अंग्रेज़ीयत का असर कहाँ से होता।
हाई स्कूल और इंटर भी बुद्ध की शरण में हुआ। आज के ज्ञान चक्षु से देखता हूँ तो ख़ुद से लेकर पूरा परिवेश तक अज्ञानी नज़र आता है। वैसे उस दौर में केवल एक डे के बारे में पता था- क्रिसमस डे । लेकिन उसे भी हम लोग क्रिसमस डे कम और बड़ा दिन ज़्यादा जानते थे।
इंटर के बाद मेरी कर्मभूमि बनी – इलाहाबाद। इलाहाबाद में बी०एस सी० में प्रवेश लिया था । लेकिन वहाँ भी दो साल बीत गए लेकिन इस डे का ज्ञान मुझे प्राप्त नहीं हो पाया था।इस ख़ास डे के नाम से पहली बार मैं छात्रावास में जाने के बाद तृतीय वर्ष में परिचित हुआ।
इस स्पेशल डे से सर्वप्रथम मेरे एक सीनियर ने परिचय कराया था। वो लखनऊ से पढ़े-बढ़े थे , अतः इस डे से परिचित थे , अन्यथा इलाहाबाद तो ख़ुद ग्रामीण परिवेश ओढ़े था। वैसे लखनऊ इलाहाबाद से फ़ास्ट है , ये केवल सुना था , लेकिन २००१ में ख़ुद महसूस भी कर लिया जब लखनऊ में ही मुझे आजीविका के लिए प्रवास करना पड़ा।
हॉ तो खाना खाकर उन सीनियर के कमरे में बैठे थे। मेरे साथ चिंटू भाई भी थे। सर ने हमसे पूछा-" बालकों , वेलेंटाइन डे को मनाने की तैयारी कैसी चल रही है? कोई प्लान है कि नहीं?"
इतना अटपटा नाम सुनकर ही हम लोग सन्न हो गए। मन में सोचा-" ये कौन सी बला है? आज तक तो इसका नामे नहीं सुना। नाम भी थोड़ा जटिल है।"
वैसे लोगों का सामान्य लक्षण होता है कि वो अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन सीधे नहीं करते। किसी विषय की जानकारी न होने पर भी सामने वाले के समक्ष सरलता से समर्पण नहीं करते , बल्कि तर्क-कुतर्क करने लगते हैं। शायद यही बात मेरे भी अन्दर थी। परंतु जब व्यक्ति विषय से नितांत अनभिज्ञ हो , तब दो स्थितियाँ बनती हैं- व्यक्ति विषयांतर कर अपनी अज्ञानता को अनावृत होने से बचा ले या अपनी अज्ञानता स्वीकार कर विषय का ज्ञान प्राप्त कर ले ताकि भविष्य में ऐसी असहज स्थिति से बच सके। वो सीनियर बड़े भाई जैसे थे , तो हमने दूसरा विकल्प अपनाते हुए अज्ञानता को स्वीकार कर लिया।
उनसे बोला-" सर नाम से ही ये भारी डे लग रहा है। लेकिन सर ये वेंटाइन डे होता क्या है?"
सर ने कहा-" वेंटाइन नहीं वेलेंटाइन।"
मैं बोला-" सर इसीलिए न कह रहा भारी है । इतना भारी कि मेरी जिह्वा भी इसे ठीक प्रकार से धारण नहीं कर पा रही।"
सर हँसते हुए कहे-" अरे युवा होकर भी इस डे से अपरिचित।"
उनका इतना कहना था कि मेरे शर्म की मात्रा बढ गयी और मुझे लगा कि इस डे को न जानना भारत की राजधानी न जानने के समान ही अज्ञानता है। परंतु अब तो क़लई उघर चुकी थी , तो थोड़ी इज़्ज़त बचाने के लिए कहा-" सर युवा होने मात्र से सम्पूर्ण ज्ञान हो सकता है क्या? वैसे ज्ञान का फलक इतना विस्तृत है कि कोई व्यक्ति उसका १०% भी ज्ञान प्राप्त कर ले , तो बहुत है।"
उन्होंने कहा-" बात तुम्हारी सही है। इस डे का परिचय अभी लोगों से कम ही हुआ है । ये अभी महानगरों में ही अपनी पैठ बना पायी है। लेकिन जान लो कि ये प्रेम दिवस है।"
उनका इतना कहना था कि मैं बैकफ़ुट से तुरंत फ़्रंटफ़ुट पर आकर उनसे सवाल दाग़ दिया-"तो क्या सर शेष दिवस नफ़रत के होते हैं?"
तब उन्होंने कहा-" इस दिवस के प्रेम दिवस होने का मतलब ये नहीं कि शेष दिवस नफ़रत के होते हैं । हम लोग होली में भी ख़ुश रहते हैं , लोगों से मिलते हैं । इसका मतलब ये तो नहीं कि शेष दिन उनसे लड़ते हैं । उसी तरह इस दिवस का भी प्रतीकात्मक महत्व है। ये प्रेम के इजहार का दिवस माना जाता है। "
उनका इतना कहना था कि चिंटू भाई तपाक से बोले-" तो क्या सर , इस दिवस को किसी को इजहार किया जा सकता है? ऐसा करने पर कोई उग्र प्रतिक्रिया तो नहीं न होगा सर?"
सर ने कहा-" हाँ कर सकते हो ?"
लेकिन मैंने जोड़ा-" चिंटू भाई हेलमेट पहन कर ही इजहार करने जाना। परंतु अब हेलमेट तो मिलने से रही। तो इस दिवस का नाम सुनकर ही प्रेमनुभूति कर लो। इसके आयोजन में भागीदारी मत करना। वैसे प्रेम के स्फूरण का प्रथम चरण एक-दूसरे को जानना और कोमल भावों को अनुभूत करना है। तुलसीदास ने कहा भी है- जानिहु बिनु न होई परतीति, बिनु परतीति होऊ न प्रीति।"
सर ने भी कहा-" अगर कोई ऐसा है , जिससे तुम्हारा भाव-स्वभाव मिल रहा तब कर सकते हो। अन्यथा अंग-भंग का भी योग बन सकता है।"
फिर मैंने अधिक जानकारी के लिए सर से पूछा-"सर ये वेलेंटाइन व्यक्ति था , जाति था या भाव था? आख़िर क्या था ये?"
सर ने कहा-" कहा जाता है कि वेलेंटाइन कोई संत थे , जो प्रेमियों को आश्रय देते थे और प्रेम भाव का प्रसार करते थे।"
मैंने कहा-" सर , बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने मेरा ज्ञानवर्धन किया और मैं एक इंटर्नैशनल डे से परिचित हुआ।"
कुछ वर्षों के बाद मैंने इस पर्व का काफ़ी विस्तार पाया तथा इसके रोकथाम के लिए भी कुछ दल सामने आए । शायद भारत में मोरल पुलिसिंग का उदय भी इसी डे के कारण हुआ।
वैसे जिस उम्र में मैं इस डे से परिचित हुआ , उससे ज़्यादा वर्ष अब मेरी उम्र में जुड़ चुके हैं। मैंने इसका व्यापक विस्तार देखा है । समय के साथ इसका दायरा भी बढ़ा है और दिन भी । अब ये डे से आगे बढ़कर वीक में परिवर्तित हो गया है। आज शहरों की कौन कहे गाँव का बच्चा भी इस डे से अपरिचित नहीं होगा।
लेकिन प्रेम दिवस का विस्तार तो हो रहा है , परंतु लोग तंगदिल होते जा रहे हैं। नफ़रत , आक्रोश , क्रोध ही लोगों के स्थाई भाव बनते जा रहे हैं , तब ये लगता है कि दुनिया को वास्तव में प्रेम की आवश्यकता है । लेकिन प्रेम वो नहीं जो प्रदर्शन की माँग करता है , बल्कि प्रेम तो समर्पण की माँग करता है । ये अहसासों को संजोता है। प्रेम तो हृदय का व्यापार है , ये तो दिलों को दिलों से जोड़ता है । प्रेम का पारावार नफ़रत की दीवार को ध्वस्त कर सकता है । ऐसे में प्रेम की ज़रूरत महसूस की जा सकती है। ऐसे में राहत इंदौरी की पंक्तियाँ मुझे याद आ रहीं-
फूलों की दुकानें खोलो, ख़ुशबू का व्यापार करो
इश्क़ ख़ता है तो ये ख़ता इक बार नहीं सौ बार करो।

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अजय कुमार मिश्र
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रचना क्षेत्र में मेरा पदार्पण अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को निखारने के उद्देश्य से हुआ। लेकिन एक लेखक का जुड़ाव जब तक पाठकों से नहीं होगा , तब तक रचना अर्थवान नहीं हो सकती।यहीं से मेरा रचना क्रम स्वयं से संवाद से परिवर्तित होकर सामाजिक संवाद का रूप धारण कर लिया है। कविता , शेर , ग़ज़ल , कहानियाँ , लेख लिखता रहा हूँ।

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