मेरा बंगला

Ranjana Mathur

रचनाकार- Ranjana Mathur

विधा- कहानी

मोनू दोस्तों से तन कर बोला-"फिकर न कर मैं ले आता हूँ तेरी गेंद। ये तो मेरा ही बंगला है।" पानी से भरे स्वीमिंग पूल में दोस्त कल्लू की फूटी गेंद जा गिरी थी। अंदर जाने लगा तो मेन गेट पर गार्ड ने ललकारा – – "ओ कहां चला आ रहा है मुंह उठाए " मोनू को यह उम्मीद ही नहीं थी क्योंकि जब यह बंगला बन रहा था तब मां कमली और बापू धरम जी के साथ वह बीसियों बार इस बंगले पर आया था। एक बार तो आधा बंगला तैयार होने के बाद वह उन सुंदर धुले कमरों में गंदे पैर लेकर पहुंच गया था। तब मां ने मुझे आंटी जी के सामने बहुत मारा था। उस वक्त आंटी जी ने ही माँ से मुझे छुड़ा कर अपने से चिपका कर कहा था – "कोई बात नहीं। ये तेरा ही घर है बेटा आराम से घूम।" हांलाकि मां ने घर पर बहुत समझाया था कि ऐसा कुछ नहीं है जब तक उनका हम से मतलब है तब तक की ही यह मीठी बोली है। यह बड़े लोगों के तरीके तू नहीं समझेग बेटा। "उस समय भी मोनू जिद पर अड़ गया कि बंगला हमारा ही है क्योंकि बनाया तो हमने है ना मां।बाल बुद्धि को मां न समझा सकी उसने अपना सिर पीट लिया।
पिछले दस दिन पहले तक आंटी जी बहुत प्यार से बोलती थी। जब वह बंगले का काम पूरा होने पर बापू के साथ बंगले की धुलाई सफाई कर रहा था। तब उन्होंने मां बापू और उसे चाय के साथ कुछ खाने को भी दिया था। तभी मोनू ने धीरे से पूछा था बापू अपना बंगला तैयार हो गया न। तिस पर आंटी जी ने हंसते हुए मोनू के गाल को प्यार से छूकर कहा था कि" हां बेटा तेरा ही है तू जब चाहे यहां आ सकता है। "बालक का भोला पन उसे इसीलिये यहां खींच लाया।

वह गार्ड से तनकर बोला -" अरे ये तो मेरा बंगला है। मेरे मां बापू ने इसे पूरा बना कर खड़ा किया है और हम सब ने मिलकर इसे साफ किया और सजाया है। न मानो तो आंटी जी से पूछ लो। वे भी कहती हैं कि हम कभी भी यहां आ सकते हैं।"
अच्छा। गार्ड ने आंखें फैला कर डंडा दिखाया। तभी एकाएक संयोग वश घर की मालकिन आंटी जी अपनी सहेलियों के साथ तीन चमचमाती लम्बी विदेशी कारों में से बंगले में प्रवेश कर सामने लाॅन में उतरीं। उतरते ही गंदे- फटे लिबास में एक गंवार बच्चे को देख गार्ड पर भड़क उठीं–"चौकीदार इन गंदे संदे लोगों को अंदर कैसे आने दिया।
तुरंत बाहर निकाल कर मैन गेट के एरिया का फिर से झाडू पौंछा लगवाओ। गंदा कर दिया सारा।"और उन्होंने एक बार भी उस पर नजर तक डालना भी उचित नहीं समझा। मोनू आगे हाथ बढ़ा कर धीरे से बोला – "आंटी जी मैं मोनू धरम जी का बेटा।" मगर जोर के धक्के के कारण उसके शब्द हवा में बिखर गए।
बाहर आ कर दोस्तों के सामने बुरी तरह रो पड़ा। आज वह मां की बात समझ चुका था। उन्होंने एक बार भी उस पर नजर तक नहीं डाली।

रंजना माथुर
दिनांक 26/06/2017 को मेरी स्व रचित व मौलिक रचना।
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Ranjana Mathur
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भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों व " सरिता" में रचनाएँ प्रकाशित। जयपुर के पाक्षिक पत्र "कायस्थ टुडे" एवं फेसबुक ग्रुप्स "विश्व हिंदी संस्थान कनाडा" एवं "प्रयास" में अनवरत लेखन कार्य। लघु कथा, कहानी, कविता, लेख, दोहे, गज़ल, वर्ण पिरामिड, हाइकू लेखन। "माँ शारदे की असीम अनुकम्पा से मेरे अंतर्मन में उठने वाले उदगारों की परिणति हैं मेरी ये कृतियाँ।" जय वीणा पाणि माता!!!

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