मूर्खता

Pritam Rathaur

रचनाकार- Pritam Rathaur

विधा- कुण्डलिया

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मानव की यह मूर्खता, समझे तनिको नाहि।
ईश्वर घट में रम रहा, खोजै मंंदिर माहि ।।
खोजै मंंदिर माहि , करै नित नित झाडू पोंछा
मन में कतनी गंदगी, कबहूं नहि यह सोचा
कवि "प्रीतम " कह रहे, खोलो मन के द्वार
करौ न ऐसन मूर्खता, कबहुं न हो उद्धार ।।

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Pritam Rathaur
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मैं रामस्वरूप राठौर "प्रीतम" S/o श्री हरीराम निवासी मो०- तिलकनगर पो०- भिनगा जनपद-श्रावस्ती। गीत कविता ग़ज़ल आदि का लेखक । मुख्य कार्य :- Direction, management & Princpalship of जय गुरूदेव आरती विद्या मन्दिर रेहली । मानव धर्म सर्वोच्च धर्म है मानवता की सेवा सबसे बड़ी सेवा है। सर्वोच्च पूजा जीवों से प्रेम करना ।

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