मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

Salib Chandiyanvi

रचनाकार- Salib Chandiyanvi

विधा- कविता

मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

जहां तक फलक की ये चादर तनी है
जहां तक ज़मी तेरी मौला बिछी है
ज़मीं से फलक तक जो वुसअत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

पहाड़ों को तोला तो हलके बहुत थे
समन्दर को नापा तो उथले बहुत थे
जो सूरज से पूछा तो कुछ भी न बोला
हवाओं के लब पे भी ताले बहुत थे
हरेक शय थी छोटी मुहब्बत बडी थी
कि मुझपर खुदा की इनायत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

जो हैं आसमा पर सितारे वो कम हैं
नज़र में हैं जितने नज़ारे वो कम हैं
दरख्तों ने फल जो उगाये वो कम हैं
जो सूरज को बख़्शे उजाले वो कम हैं
है जो कुछ निगाहों के आगे वो कम है
मुझे अपनी मां की ज़रुरत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

कोई मेरे दामन को दौलत से भर दे
कोई मुझको दुनिया का सुल्तान कर दे
कोई मुझको जन्नत की लाकर ख़बर दे
कोई शय मुझे इससे बढकर अगर दे
मिले मां के बदले तो हरग़िज़ न लूँगा
बताओ भला इनकी क़ीमत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी
मुझे अपनी मां से मुहब्बत है इतनी

बेहतरीन साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ आपके लिए- यहाँ क्लिक करें

Views 20
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
Salib Chandiyanvi
Posts 26
Total Views 211
मेरा नाम मुहम्मद आरिफ़ ख़ां हैं मैं जिला बुलन्दशहर के ग्राम चन्दियाना का रहने वाला हूं जाॅब के सिलसिले में भटकता हुआ हापुड आ गया और यहीं का होकर रह गया! सही सही याद नहीं पर 18/20की आयु से शायरी कर रहा हूँ ! उस्ताद तालिब मुशीरी साहब का शाग्रिद हूँ पर ज्यादा तर मैने फेस बुक से सीखा जिसमें मनोज बेताब साहब, कुंवर कुसुमेश साहब, मुख्तार तिलहरी साहब का बहुत बडा हाथ है !

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia