मुक्तक

Rishav Tomar (Radhe)

रचनाकार- Rishav Tomar (Radhe)

विधा- मुक्तक

कही नफरत कही चाहत कही मुश्किल जमाने में
खुदा का नूर बसता है गजल औऱ गीत लिखने में
मैं कैसे लिख दूँ तुमको रात मेरी ज्योत्स्ना बतला
कि हर एक रंग छुपाता है तेरे रुख के नकाबों में

कोई कैसे समझ पाता मोहबत को इबादत को
अभी हम खुद नही समझे हसीं की इबादत को
बताओ कैसे समझाये बताओ कैसे बतलाये
कि हर एक पल गुजरता है यहाँ रोटी कमाने को

ये कैसा दौर है कि सदाकत गुम है मेरी जाँ
हँसी के घर मे भी साथी यहाँ गम है मेरी जाँ
कोई कैसे निभाये चाह में कसमो रिवाजो को
यहाँ दिल तोड़ने का रोज का फैसन है मेरी जाँ

गुजरी उम्र सारी बाप ने इज्जत कमाने में
गुजरी उम्र ये हमने ये यहाँ रोटी कमाने में
वहाँ गम का कभी राधे कोई साया नही आया
बुजर्गों की कदर रहती है जिसके आशियाने में

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Rishav Tomar (Radhe)
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ऋषभ तोमर पी .जी.कॉलेज अम्बाह मुरैना बी.एससी.चतुर्थ सेमेस्टर(गणित)

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