मुक्तक

Rishav Tomar (Radhe)

रचनाकार- Rishav Tomar (Radhe)

विधा- मुक्तक

कही नफरत कही चाहत कही मुश्किल जमाने में
खुदा का नूर बसता है गजल औऱ गीत लिखने में
मैं कैसे लिख दूँ तुमको रात मेरी ज्योत्स्ना बतला
कि हर एक रंग छुपाता है तेरे रुख के नकाबों में

कोई कैसे समझ पाता मोहबत को इबादत को
अभी हम खुद नही समझे हसीं की इबादत को
बताओ कैसे समझाये बताओ कैसे बतलाये
कि हर एक पल गुजरता है यहाँ रोटी कमाने को

ये कैसा दौर है कि सदाकत गुम है मेरी जाँ
हँसी के घर मे भी साथी यहाँ गम है मेरी जाँ
कोई कैसे निभाये चाह में कसमो रिवाजो को
यहाँ दिल तोड़ने का रोज का फैसन है मेरी जाँ

गुजरी उम्र सारी बाप ने इज्जत कमाने में
गुजरी उम्र ये हमने ये यहाँ रोटी कमाने में
वहाँ गम का कभी राधे कोई साया नही आया
बुजर्गों की कदर रहती है जिसके आशियाने में

Sponsored
Views 26
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Rishav Tomar (Radhe)
Posts 37
Total Views 588
ऋषभ तोमर अम्बाह मुरैना मध्यप्रदेश से है ।गणित विषय के विद्यार्थी है।कविता गीत गजल आदि विधाओं में साहित्य सृजन करते है।और गणित विषय से स्नातक कर रहे है।हिंदी में प्यार ,मिलन ,दर्द संग्रह लिख चुके है

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia