मुक्तक

Manjusha Srivastava

रचनाकार- Manjusha Srivastava

विधा- मुक्तक

रोटी
(1)
मन क्लान्त है दुख शोक से सम्भावनाएँ शून्य हैं |
स्पंदन हीन सभी दिखते मनभावनाएँ शून्य हैं |
मासूम रोटी को तरसते दर्द को नित सह रहे –
गंदी सियासत पल रही संवेदनाएँ शून्य हैं |

(2)
ख्वाब बुनते नित नयन सपने सुहाने देखते हैं |
नित नये करतब दिखाते रोज ही दम तोड़ते हैं |
पूर्ति और आपूर्ति की लहरों में गोते रोज खाते –
शब्द और भावों की हर दम रोटियाँ वो सेंकते हैं |

(3)
रोटी का ही सब चक्कर रोटी का ही सब खेल है |
इसके कारण मानव पिसता बन जाता जस रेल है |
पेट अगर ना होता यारों कितना अच्छा होता –
होते ना अपराध जगत में गहराता बस मेल है |
©®मंजूषा श्रीवास्तव

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