मुक्तक—विजय पर्व—डी के निवातिया

डी. के. निवातिया

रचनाकार- डी. के. निवातिया

विधा- मुक्तक

*—-विजय पर्व —-*

पूजा, भक्ति, ज्ञान, ध्यान में था वो देवो का ख़ास ।
सुत, बंधू, सगे, सेवक सहित किया कुल का नाश ।
अधर्म और अहंकार सदैव अहितकारी होते है ।
इन द्वेषो ने किया रावण सहित लंका का विनाश ।।

मन से मैले हुए सभी, तन वस्त्र सब चमका दिये ।
झूठी परम्परा निभा, रावण के पुतले जला लिये ।
विषय वासना लोभ के अधीन हुआ जन मानष ।
उर विकार मिटे नही उत्सव विजय पर्व मना लिये ।।




डी के निवातियाँ —-+

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डी. के. निवातिया
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नाम: डी. के. निवातिया पिता का नाम : श्री जयप्रकाश जन्म स्थान : मेरठ , उत्तर प्रदेश (भारत) शिक्षा: एम. ए., बी.एड. रूचि :- लेखन एव पाठन कार्य समस्त कवियों, लेखको एवं पाठको के द्वारा प्राप्त टिप्पणी एव सुझावों का ह्रदय से आभारी तथा प्रतिक्रियाओ का आकांक्षी । आप मुझ से जुड़ने एवं मेरे विचारो के लिए ट्वीटर हैंडल @nivatiya_dk पर फॉलो कर सकते है. मेल आई डी. dknivatiya@gmail.com

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2 comments
  1. 🙏🙏🙏🙏आपको और आपके आदरणीय परिवार को मेरे तरफ से दशहरा की हार्दिक बधाई 🙏🙏🙏🙏