मात पिता

विजय कुमार अग्रवाल

रचनाकार- विजय कुमार अग्रवाल

विधा- कविता

नये साल में कसम उठाओ , जीने का अंदाज़ बदल दो ।
मात पिता की सेवा करलो , घर के सारे नियम बदल दो ॥
कष्ट उन्हे नहीँ होने देंगे , इसी को अपना धर्म समझ लो ।
कर्ज उतार नहीँ सकते हो ,जीवन उनकी देन समझ लो ॥
मात पिता ने जो भी कमाया ,सब कुछ तुम पर ही तो लगाया ।
इसी लिये तुम बन गये अफसर ,इस को अपना भाग्य समझ लो ॥
खुद से पहले तुम्हे खिलाया बचने पर ही खुद कुछ खाया ।
आज वो हो गये तुम पर निर्भर ,बात यही बस तुम भी समझ लो ।
जीवन के अंतिम पड़ाव में , उनको सारी खुशियाँ दे कर ।
स्वर्ग बना लो अपने घर को , और उनका यह दर्द समझ लो ॥

विजय बिज़नोरी

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विजय कुमार अग्रवाल
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मै पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर शहर का निवासी हूँ ।अौर आजकल भारतीय खेल प्राधिकरण के पश्चिमी केन्द्र गांधीनगर में कार्यरत हूँ ।पढ़ना मेरा शौक है और अब लिखना एक प्रयास है ।

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