महिला शिक्षा की करामात

Santosh Barmaiya

रचनाकार- Santosh Barmaiya

विधा- कविता

अभी नींद भी न खुली थी!और
जोर की आवाज आई!
ऐ मिस्टर!
हैलो, गुड मॉर्निंग!
आपके लिए है ये वॉर्निंग!
मुझे जल्दी है ऑफिस जाना।
खाना रोज की तरह चटपटा बनाना।
और लंच बॉक्स मय कॉफी ले,
सीधे ऑफिस चले आना।
ये है तुम्हारी बीबी का फरमाना।।
पहुंचा,पहुंचा,ला -लाकर,
रोजाना रूटिंन से तंग आकर,
"महोदया" से किया सवाल!
मेडम, ये क्या बात है?
ये अंत है या शुरुआत है?
मेडम ने दिया जवाब,जनाब-
ये अंत नही शुरुआत है।
ये "महिला शिक्षा" की करामात है।
अभी तो हम सिर्फ साक्षर हो रहे है,
आगे तो पड़ा सारा जमाना है।
बनाने, खाने,धोने से लेकर,
हर काम पुरुषों से करवाना है।
और यदि महिलाएं बनी कहीं"वैज्ञानिक",
तो बच्चे भी पुरुषों से पैदा करवाना है।।
रचियता
संतोष बरमैया"जय"

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Santosh Barmaiya
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मेरा नाम- संतोष बरमैया"जय", पिताजी - श्री कौशल किशोर बरमैया,ग्राम- कोदाझिरी,कुरई, सिवनी,म.प्र. का मूल निवासी हूँ। शिक्षा-बी.एस.सी.,एम ए, बी.ऐड,।अध्यापक पद पर कार्यरत हूँ। मेरी रचनाएँ पूर्व में देशबन्धु, एक्स प्रेस,संवाद कुंज, अख़बार तथा पत्रिका मछुआ संदेश, तथा वर्तमान मे नवभारत अखबार में प्रकाशित होती रहती है। मेरी कलम अधिकांश समय प्रेरणा गीत तथा गजल लिखती है। मेरी पसंदीदा रचना "जवानी" l

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