महक बाकी भी तक है

बसंत कुमार शर्मा

रचनाकार- बसंत कुमार शर्मा

विधा- गज़ल/गीतिका

छुआ था जुल्फ को तेरी, महक बाकी अभी तक है
पुरानी उस मुहब्बत की, कसक बाकी अभी तक है

छनन छन पायलों की सुन, जगा हूँ ख्वाव में हर पल
तुम्हारी चूड़ियों की वो, खनक बाकी अभी तक है

पुरानी हो गयी है अब, भले ही डाल फूलों की
मगर वो बचपने वाली, लचक बाकी अभी तक है

अमावस रात थी लम्बी, अँधेरे से लड़ा दम भर
दिया बुझने लगा लेकिन, चमक बाकी अभी तक है

जमी तो है जरा सी राख उस अंगार पर, लेकिन
कहीं अन्दर धधकती वो, लहक बाकी अभी तक है

निगाहें हट नहीं पाती, कहाँ तक रास्ते बदलें
तुम्हारे घर को’ जाती जो, सड़क बाकी अभी तक है

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बसंत कुमार शर्मा
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भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन

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