मसलहत

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- कविता

मसलहत थी इक आशियां बनाने की
तुम बना बैठे महखाने को अपना घर ।
तल्ख़ कर बैठे जिन्दगी अपनी
ज़ाम-ए-ज़हर जो सीने में उतरा तुमने
परतोख़ बहुत थे तुम्हारे सामने
पर अंधा कर दिया इस ज़ाम ने
अब तो संभलो यह जिंदगी तुम्हारी है
बहुत जारीबाना चुकाया तुमने इस ज़ाम का
अब तो छोड़ने का बेख़ता अख़्तियार है तुमको
या अब भी प्यार मयस्सर है इससे
अगर है भी तो तब्दील करो यार इसमें
जवाबदेह होना है ख़ुदा के इजलास में
मसलहत है अब भी प्यार के असबाब की
मसलहत थी इक आशियां बनाने की
तुम बना बैठे महखाने को अपना घर ।।
👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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