मन

अनीला बत्रा

रचनाकार- अनीला बत्रा

विधा- कविता

कभी कभी तन्हाई भी खूबसूरत लगती है और कभी किसी के साथ को मन बेकरार होता है,कभी कभी मन ओढ़ लेता है नक़ाब बेसाख्ता और कभी किसी पर खुद को निसार करने को जी चाहता है।

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अनीला बत्रा
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'ऐ ज़िन्दगी कुछ ख़ास नहीं हैं चाहतें मेरी, थोड़ी सी मुस्कान लबों पर और थोड़ी सी पहचान दिलों में..' पंजाब के शिक्षा विभाग में सीनीयर सैकेंडरी स्कूल में हिन्दी विषय की अध्यापिका हूँ।पंजाब विश्वविद्यालय से भूगोल विषय में आॅनर्स और एम.ए.(हिन्दी) किया है। भाषा मुझे अत्यन्त प्रिय है और हिन्दी साहित्य में रुचि है।प्रयास करती हूँ कि मेरे कारण किसी के हृदय को ठेस न पहुंचे।

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