मन की लगाम।

प्रेम कश्यप

रचनाकार- प्रेम कश्यप

विधा- कविता

चल इधर आ
बैठ सुन उधर मत देख
यहाँ मुझ से बात कर
कभी दुसरों की बात नही सुनते
कभी दुसरों को बुरा नही कहते
वो देख हरे भरे खेत बाग बगीचे
हे भगवान!छोड़ ये झगड़ा
अब मान जा
ये तेरा मेरा छोड़
सब माया है
क्या खाऊं क्या न खाऊ
ऐसी इच्छामत कर
ऊंची उड़ान ये अच्छा है
कम थकान ये अच्छा है
सत्य को जान ये अच्छा है
मन की लगाम
पकड़ना नही है आसान।

रचनाकार :– प्रेम कश्यप

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प्रेम कश्यप
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मैं शिक्षा विभाग मे 1995 से अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। कविता पढ़ना मुझे शुरू से अच्छा लगता था।कई बार लिखने का प्रयास भी किया।
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