“मन”…….. काजल सोनी

Kajal Soni

रचनाकार- Kajal Soni

विधा- कविता

मन की बातें मन ही जाने,
कोई और समझ न पाये ।
कभी तन्हा,
कभी गुमसुम बैठे ,
कभी तितली बन उड़ जाये।

देख परिंदों की हलचल,
बच्चों के संग बच्चा बनकर,
खुशियों की ये मस्ती में नाचे,
कभी शोर इसे न भाये ।

लगे कभी महीनों न नहाऊं,
कभी छत से टपकती बारिश में,
तर तर भीग जाये ।

कभी रुसवा ,
कभी पागल रहता ,
मोहब्बत कभी ये बरसाये ।

खाने को कभी जी न लागे,
संग यारों के कभी बैठकर,
जुठा भी छीन छपट कर खाये ।

कभी गम की आग में जलता ,
देख तरसता,
और मचलता,
कभी खुद ही समहल ये जाये ।

मन की बातें मन ही जाने ,
कोई और समझ न पाये । ।

" काजल सोनी "

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