तेरे हुसन की लालिमा(गज़ल)

Mandeep Kumar

रचनाकार- Mandeep Kumar

विधा- गज़ल/गीतिका

तेरे हुसन की लालिमा/मंदीप

देख तेरे हुसन की लालिमा से सारी फिजा मदहोस हो जाये,
चले जब तू ये हसींन कुदरत भी सरमा जाये।

सान,सकल ऐसी हो संगेमरमर की कोई मूर्त्त,
तुम को जो देखे वो कभी भुला न पाये।

जहाँ से भी गुजरें तू मदमस्त हसीना,
वो समा वो पल वही थम जाये ।

देख तेरे होंटो की खूबसूरत हँसी,
उपवन का हर एक फूल खिल जाये।

अगर मिल जा जाओ मोहिनी एक बार,
"मंदीप्"की भी जिंदगी सवर जाये।

मंदीपसाई

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Mandeep Kumar
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नाम-मंदीप कुमार जन्म-10/2/1993 रूचि-लिखने और पढ़ाने में रूचि है। sirmandeepkumarsingh@gmail.com Twitter-@sirmandeepkuma2 हर बार अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ। और रही बात हम तो अपना दर्द लिखते है।मेरा समदिल मेरे से खुश है तो मेरी रचना उस के दिल का बखान करेगी।और जब वो रूठता है तो मै मेरे दिल का बखान करूँगा।हा पर बहुत अच्छा है वो और मेरे दिल में उस के लिए खास ही जगह है ।जहाँ तक कोई पहुँच भी नही पायेगा। मेरा दिल जरूर दुःखता है पर मेरा दिल उसे बार बार माफ़ कर देता है।

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