* मत मार गर्भ में मुझको माता *

Neelam Ji

रचनाकार- Neelam Ji

विधा- कविता

मत मार गर्भ में मुझको माता ,
कर थोड़ा तो रहम मेरी दाता ।
तुम ही मुझको मारोगी अगर ,
कौन बनेगा फिर मेरा विधाता ।।

क्या मैं तुम्हारा अंश नहीं माता
क्यूँ मेरा आना तुमको नहीं भाता
बता मुझको कौन बचाएगा ?
जब दुश्मन बन जाए खुद माता ।।

बेटी बिन कोई घर न बस पाता ,
बेटी बिन कोई वंश न बढ़ पाता ।
बेटी नहीं बेटों से कम मेरी माता ,
है कौन जगह जहाँ बेटी नहीं माता ।।

क्यों है बेटी से नफरत का नाता ,
तुम भी तो किसी बेटी हो माता ।
हर सुख दुःख में साथ निभाऊंगी ,
आने दो मुझे इस दुनिया में माता ।।

बेटे से बढ़कर नाम कमाऊंगी ।
बेटे की कमी पूरी कर दिखलाऊंगी ,
बेटी कोमल है कमजोर नहीं माता ,
तेरी लिए सारी दुनिया से लड़ जाऊंगी ।।

मत मार गर्भ में मुझको माता ,
कर थोड़ा तो रहम मेरी दाता ।
तुम ही मुझको मारोगी अगर ,
कौन बनेगा फिर मेरा विधाता ।।

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Neelam Ji
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मकसद है मेरा कुछ कर गुजर जाना । मंजिल मिलेगी कब ये मैंने नहीं जाना ।। तब तक अपने ना सही ... । दुनिया के ही कुछ काम आना ।।

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