मजदूर दिवस

डॉ संगीता गांधी

रचनाकार- डॉ संगीता गांधी

विधा- लघु कथा

………………..
"मैं पैसे नहीं दूंगी !.. आज मजदूर दिवस है , मालकिन ने खुश होकर तनख्वाह से अलग थोड़ा इनाम दिया है " ।
" तुम तो शराब में उड़ा दोगे " ! — सुक्खी ने पति का प्रतिकार करते हुए चिल्ला कर कहा ।
"पैसे देती है या नहीं " ..जानती है न वरना तेरा क्या हाल करूँगा !
तीनो बच्चे झुग्गी के एक कोने में सहम कर दुबके हुए थे ।मां सुक्खी को मारना और पैसे मांगना उनके पिता का रोज का काम था ।
पैसे दे !
नहीं दूंगी !
तो ले फिर! …गंगू ने पास पड़ा लोहे का चिमटा सुक्खी के सिर पर दे मारा ।
सुक्खी माथे से बहते खून को थामे फर्श पर गिर पड़ी ।
उसकी मुट्ठी में भींचे रुपये छीन कर गंगू झुग्गी से बाहर निकल गया
साथ ही बड़बड़ा रहा था —
बाहर मैदान में एक रैली हो रही थी ,जिसमें स्त्री शक्ति ,नारी और मजदूर अधिकारों पर बड़े बड़े भाषण दिये जा रहे थे ।ये भाषण सुक्खी के कानों को चीर रहे थे ।
बाहर शराब पी कर गंगू बड़बड़ा रहा था ……..
" बड़ी आयी मजदूर दिवस वाली

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