मकानों के जंगल

सन्दीप कुमार 'भारतीय'

रचनाकार- सन्दीप कुमार 'भारतीय'

विधा- कविता

धराशायी होते जा रहे हैं वृक्ष,
उग रहे हैं मकानों के जंगल,
उजड़ रहे प्राकृतिक आवास,
मानव मानव का कर रहा ह्रास,
पशु आ रहे मानव बस्ती में,
मानव है अपनी ही मस्ती में,
बेमौसम बरस रहा है जल,
उग रहे है मकानों के जंगल |

धुआँ धुआँ हो रहा वातावरण,
हवा में बस चुके है धूल के कण,
थोड़ा चलना साँसे फुला रहा है
मानव अस्तित्व डगमगा रहा है
हमारी नींव हो रही है खोखली,
विकास की आँधी ऐसी चली,
पर्यावरण हर पल रहा है बदल
उग रहे हैं मकानों के जंगल ।

धराशायी होते जा रहे हैं वृक्ष
उग रहे हैं मकानों के जंगल ।

" सन्दीप कुमार "

Sponsored
Views 59
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
सन्दीप कुमार 'भारतीय'
Posts 63
Total Views 5.1k
3 साझा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं | दो हाइकू पुस्तक है "साझा नभ का कोना" तथा "साझा संग्रह - शत हाइकुकार - साल शताब्दी" तीसरी पुस्तक तांका सदोका आधारित है "कलरव" | समय समय पर पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित होती रहती हैं |

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia