**भौतिकता के आधार से सतयुगी प्रयास**

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

ये कैसी विडंबना इस भौतिक-युग से आरंभ हुई,
जो बढ़ना चाहिए सुख-चैन अमन और नींद भला,सब कुछ ..उलट-पुलट हो जाता हैं,

कहा जिसको कलियुग जाता है,
कलपुर्जों और मशीनें जो बनी ऐशो-आराम के खातिर..कर देती हैं क्यों? बेचैन भला,

जो युग जीव जीवन के मूल्य को गिरा देता है,
आस्था जड़ में ….निहित रखता है,
व्यर्थ पूजन होते देखा है ….
जिसको चलाता खुद–शक्तिवान् खुद भला

सहयोगी, मददगार साबित हो भौतिकता,
इसलिए विवेक …..जगाना है,
वरदान बने विज्ञान इसलिए तत्व को …. जानना है,

अभिशाप मुक्त हो ….इंसानियत,
डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
इसी लिए जीव "जीवन की रक्षा" में कलियुग को सत् युग का आधार बनाना है,

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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