भीगी पलकों के मुरीद हो शायद

NIRA Rani

रचनाकार- NIRA Rani

विधा- कविता

मेरी भीगी पलकों के मुरीद हो शायद …

जब भी मिलते हो रुला देते हो
प्यार पर जाने क्यूं पहरा बिठा देते हो
पर जब भी रोती हूं तो गले लगा लेते हो

रोना रूलाना तो एक फसाना है
सच तो ये है कि मुझसे लडने का एक बहाना है
क्यू बेहद हो जाते हो ??
प्यार भी गुस्से से जताते हो
सिसकियो के बीच
सिर्फ तुम और तुम नजर आते हो
पर जब भी रोती हूं गले लगा लेते हो

……..
नदी के दो पाटों सा हमारा मिलना
हर वक्त यही जता देते हो
क्यूं हर वक्त ये एहसास करा देते हो
सारी बंदिशे जतला देते हो
खैरख्वाह हो मेरे
क्यूं नही हमदम बना लेते हो ….
क्यूं हर पल रुला देते हो ….
पर जब भी रोती हूं गले लगा लेते हो ..
नीरा रानी ….

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NIRA Rani
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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

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