** भाव भाषा का **

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- कविता

भाव भाषा का समझते हैं हम तभी
जब माँ की तरह प्यारी हो मातृभाषा
मात प्यारी है तात् जिस तरह हमारी
प्यारी हो मातृभाषा भी हमें हमारी
निज भाषा का गौरव होना चाहिए
वरना यह संसार रौरव से कम नहीं
हिंदी में बिंदी का उतना ही महत्त्व है
जितना नारी के माथे की बिंदी का है
बन्धन तोड़े टूटे नहीं राखी का कभी
ऐसा बन्धन हो हिन्द- हिंदी का कभी
मात्र मातृभाषा दिवस मनाना ही नहीं
आचरण में उतारना भी जरूरी है
पता नहीं क्या हमारी मजबूरी है
मातृभाषा राजभाषा में क्यों दूरी है
तुलस ने जिसे बनाया आम भाषा
बन न पायी आज राज-काज भाषा
सोचो आज विचारणीय प्रश्न है ये
रोज आते और जाते रहे हैं दिवस ये ।।
👍मधुप बैरागी

Sponsored
Views 9
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
भूरचन्द जयपाल
Posts 383
Total Views 9.4k
मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia