स्त्री की शक्ति

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

स्त्री के गर्भ से ही शुरू हो जाती है एक संघर्ष बेजुबानियाँ।
ताउम्र सहती परंपरा,रीति-रिवाज के नाम कितनी ही रूढियाँ।

अपने भीतर की आवाज को दबाकर ओढ लेती हैं चुप्पियाँ।
स्त्री की तड़प, रूदन, महत्वाकांक्षा घुटती स्वप्न की बदरियाँ ।

सिन्दूर भरी माँग, हरी-हरी लाल चूड़ियों से भरी कलाईयाँ।
तलवों में चुभते बिछुए,घुँघरू से भरी मोटी भारी पायलियाँ।

एक भारतीय स्त्री इसे कभी भी नहीं समझती हथकड़ियाँ।
ना ही किसी को अधिकार देती है इन्हें कहने को बेड़ियाँ ।

समझती हैं इन्हें आस्था की प्रतीक, सुहाग की निशानियाँ।
इनकी खनक में ये छुपाकर रखती हैं अपनी सारी शक्तियाँ।

इनमें छुपी हुई है प्रेम,समर्पण,त्याग,वात्सल्य की कहानियाँ।
मर्दों से कम मत आँको इसे ये देती आई लाखों कुर्बानियाँ।

चूड़ीवाला हाथ को ना समझो बेकार, ना ही नारी की कमजोरियाँ।
स्त्री मर्दों से ज्यादा बखूबी समझती है अपनी हर जिम्मेदारियाँ।

स्त्री अपनी विडंबना, विवशता, को प्रेम से करती बयाँ।
धैर्य धारण कर लेती है जब आती विपरीत परिस्थितियाँ।

इनके हाथों खिलते सृष्टि के फूल, खुशी की हर कलियाँ।
दुष्ट-दरिंदों के खातिर बन जाती हैं ये क्षण में चिंगारियाँ।

नारी अत्याचार, शोषण के विरूद्ध जब भी लड़ती लड़ाईयाँ।
मर्द हो कितना भी शक्तिशाली कभी भी कम नहीं पड़ती चूड़ियाँ।

महिलाओं से ही सजती हैं परिवार और समाज की धुरियाँ।
बहुत ही गरिमामयी, दिव्य स्वरूप है भारत की हर नारियाँ।
—लक्ष्मी सिंह

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