भारतीय संस्कृति की विशेषता तथा बचाने के उपाय

डॉ०प्रदीप कुमार

रचनाकार- डॉ०प्रदीप कुमार "दीप"

विधा- लेख

" भारतीय संस्कृति की विशेषता तथा बचाने के उपाय "
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" संस्कृति " एक ऐसी ऐतिहासिक सांस्कृतिक , भौगोलिक , दार्शनिक और नीतिगत मानवीय व्यवस्था है , जिसमें हम अपने जीवन की सार्थकता उसके प्रतिमान , व्यवहार के तरीके ,रीति-रिवाज, विचार एवं अभिव्यक्ति , सामाजिक मूल्यों , परम्पराओं , मानवीय क्रियाकलापों और आविष्कारों को समाहित रखती है | चूँकि भारत भूमि आदि-मानव की कर्मभूमि रही है , अत : भारतीय संस्कृति अपने उद्भव से ही अमूल्य निधि के रूप में अपने परम्परागत स्वरूप में अपनी निरन्तरता बनाए हुए है | यहाँ पाषाणकालीन संस्कृति से लेकर आधुनिक संस्कृति की सभी विशेषताऐं विद्यमान हैं | भारतीय संस्कृति पर यदि विहंगम दृष्टि डाली जाए तो हम पाते हैं कि हमारी संस्कृति विविधता में एकता को समाहित किये हुए है | यहाँ न केवल हिन्दू संस्कृति की बहुलता है , अपितु मुस्लिम , बौद्ध , जैन , पारसी , सिक्ख और ईसाई संस्कृति का भी अद्भुत संयोग देखने को मिलता है | भारतीय संस्कृति विविध विषयों जैसे- दर्शन , इतिहास , भूगोल , समाजशास्त्र , मानवशास्त्र इत्यादि से तादातम्य संबंध स्थापित किये हुए है | यहाँ कि भौतिक और अभौतिक संस्कृति नायाब और सर्वश्रेष्ठ है | यहाँ की संस्कृति ने प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण को अपने भीतर रचा-बसा रखा है , तभी तो भारत "विश्वगुरू " के पद पर सुशोभित है |

भारतीय संस्कृति की विशेषताऐं : ~

भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठी और विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है | इसमें अनेक विशेषताऐं विद्यमान हैं जो कि निम्नवत हैं —
परम्परागत विशेषताऐं
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१. प्राचीनता — प्राचीनता से तात्पर्य है कि हमारी संस्कृति में आदिकालीन और वैदिकयुगीन संस्कृति के साथ-साथ रामायण और महाभारत कालीन संस्कृति की विशषताऐं मौजूद हैं |
२. निरन्तरता :~भारतीय संस्कृति का स्वरूप सतत् और निरन्तर गतिशील प्रकृति का रहा है | यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रतिस्थापित होती रही है ,जो कि निरन्तर गतिमान है |
३. ग्रहणशीलता :~ भारतीय संस्कृति में मूल तत्वों की प्रधानता तो है ही , इसके साथ ही यह दूसरी संस्कृति से भी कुछ न कुछ ग्रहण करती रही है , जैसे – मुगल संस्कृति का ग्रहण |
४. वर्ण व्यवस्था :~ वर्ण व्यवस्था भारतीय संस्कृति की मूलभूत विशेषता और केन्द्रीय धुरी है | इस व्यवस्था के अन्तर्गत समाज को चार वर्णों में बाँटा गया है – ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र | दूसरे शब्दों में वर्ण व्यवस्था श्रम विभाजन की सामाजिक व्यवस्था का ही दूसरा नाम है |
५. आश्रम व्यवस्था :~ कर्म को सर्वोपरि स्थान प्रदान करते हुए भारतीय समाज में आश्रम व्यवस्था का विधान किया गया है | यह वह व्यवस्था है जिसमें सामाजिक क्रियाकलापों और निर्धारित कर्तव्यों को प्राकृतिक प्रभाव और गुणों के आधार पर विविध समूहों में विभाजित किया जाता है |
५. संयुक्त परिवार प्रणाली :~ संयुक्त परिवार प्रणाली हमारे पूर्वजों द्वारा दी गई एक अनूठी प्रणाली है , जो परिवार के समस्त सदस्यों को एकसूत्र में बाँधे रखती है | इस प्रणाली में बच्चों का मूलभूत विकास श्रेष्ठ रूप से होता है , जो कि जरूरी भी है |
६. पुरूषार्थ :~पुरूषार्थ उस सार्थक जीवन-शक्ति का योग है जो कि व्यक्ति को सांसारिक सुख -भोग के बीच अपने धर्म पालन के माध्यम से मोक्ष की राह दिखलाता है | भारतीय संस्कृति और दर्शन में मानव के लिए चार पुरूषार्थ निर्धारित किये गये हैं – धर्म ,अर्थ ,काम और मोक्ष |
७. संस्कार : ~ संस्कार का अर्थ है – परिशुद्धि | भारतीय हिन्दू संस्कृति में सोलह संस्कारों को बताया गया है | जबकि अन्य धर्मों में भी संस्कारों का प्रचलन है |
८. विविधता में एकता :~ विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की मूलभूत विशेषता है | भारत भूमि पर अनेक प्रकार की भौगोलिक , आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताऐं विद्यमान होने के बावजूद भी संस्कृति में मूलभूत एकता पाई जाती है |
९. आध्यात्मिकता और भौतिकता का समन्वय : ~ भारतीय संस्कृति में मूलत : आध्यात्मिकता और भौतिकता का समन्वय पाया जाता है ,जो कि मानवता के लिए श्रेष्ठ है |
"आधुनिक विशेषताऐं"
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वैसे तो भारतीय संस्कृति में परम्परागत विशेषताओं की बाहुल्यता है ,जो कि निरन्तर गतिशील है , परन्तु वर्तमान में इसमें कुछ आधुनिक विशेषताओं का संगम हुआ है ,जो कि अग्रलिखित हैं —
१. वर्ग व्यवस्था का उद्भव
२. संस्कृतिकरण
३. पर-संस्कृतिग्रहण
४. पश्चिमीकरण
५.आधुनिकीकरण
६. वैश्वीकरण
७. उदारीकरण
८. निजीकरण
९. तकनीकीकरण
१०. लोकतंत्रीकरण

"भारतीय संस्कृति को बचाने के उपाय"
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चूँकि वर्तमान में कुछ असामाजिक तत्वों के कारण भारतीय संस्कृति पर प्रहार हो रहा है जैसे – घुसपैठ ,भ्रष्टाचार, घोटाले ,बलात्कार, अपहरण,आतंकवाद ,असहिष्णुता ,चोरी -डकैती इत्यादि-इत्यादि | अत : भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप -"वसुधैव कुटुम्बकम" की पुनर्स्थापना के लिए कुछेक प्रयास करने अतिआवश्यक है जो इस प्रकार हैं —
१. संयुक्त परिवारों को प्राथमिकता देना |
२. वैदिक शिक्षा और नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना |
३. संस्कारों की पुनर्स्थापना |
४.नारी शिक्षा को बढ़ावा देना |
५. निर्धनता का उन्मूलन |
६. पर-संस्कृतिग्रहण के नकारात्मक प्रभाव से दूर रहना |
७. भौतिक और अभौतिक संस्कृति में सामंजस्य स्थापना |
८. बेरोजगारी उन्मूलन
९. आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना |
१० साहित्य द्वारा संस्कृति का संरक्षण और प्रसारण |
११. भ्रष्टाचार उन्मूलन |
१२. अपराधों की रोकथाम |
१३. प्रकृति-संस्कृति-मानव की प्रगाढ़ता को बढ़ावा देना |
१४. जातिगत भेदभाव का उन्मूलन |
१५. सांस्कृतिक समरसता का विकास करना |
१६. भारतीय सांस्कृतिक परिवेश की वर्तमान में पुनर्स्थापना करना |
१७. पुरातन और नूतन का संगम |
१८. सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देना |
१९. सांस्कृतिक आयोजनों को बढावा देना |
२०. संस्कृति संरक्षण हेतु सरकारी प्रयास |

—————————— — डॉ० प्रदीप कुमार "दीप"

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डॉ०प्रदीप कुमार
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नाम : डॉ०प्रदीप कुमार "दीप" जन्म तिथि : 02/08/1980 जन्म स्थान : ढ़ोसी ,खेतड़ी, झुन्झुनू, राजस्थान (भारत) शिक्षा : स्नात्तकोतर ,नेट ,सेट ,जे०आर०एफ०,पीएच०डी० (भूगोल ) सम्प्रति : ब्लॉक सहकारिता निरीक्षक ,सहकारिता विभाग ,राजस्थान सरकार | सम्प्राप्ति : शतक वीर सम्मान (2016-17) मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच ,नई दिल्ली (भारत) सम्पर्क सूत्र : 09461535077 E.mail : drojaswadeep@gmail.com

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