“भंडारा”

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- लघु कथा

"भंडारा"……एक लघु कथा
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-सामने वाले मंदिर के भगवान साक्षात हैं सेठ जी ! जो भी मन्नत मांगो तुरंत पूरा करते हैं । देखिये ना ! आज से ठीक एक साल पहले मैंने इसी मंदिर में मन्नत मांगी थी कि एक साल में मेरा सारा कर्ज़ उतर जाये तो मैं यहाँ पर भंडारा करवाऊँगा । चमत्कार हो गया सेठ जी ! एक साल पूरा होने से ठीक एक दिन पहले मेरा सारा कर्ज़ उतर गया । मुझे भंडारा करवाना है सेठ जी ! ये लीजिये भंडारे के सामान की लिस्ट ! यह सामान दे दीजिये !
– कितने पैसे हो गए सेठ जी ? -सामान पैक करवाने के बाद उसने पूछा ।
– पूरे दस हज़ार !
– अच्छी बात सेठ जी ! एक विनती करनी है आपसे !
– बोलो-बोलो ! सेठ जी आवाज़ को ऊंची करते हुए बोले ।
– ये सामान मुझे उधार तो मिल जाएगा ना सेठ जी ! भगवान की कृपा रही तो जल्दी चुका दूंगा !
सेठ जी कभी उसको तो कभी उस मंदिर को देखने लगे ।
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हरीश लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)

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हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।
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