बड़ी हो गयी है कितनी

Parul Chaturvedi

रचनाकार- Parul Chaturvedi

विधा- कविता

पीठ पे बस्ता टाँग के अपना
हिला हाथ वो स्कूल चली
बड़ी हो गयी है अब कितनी
मेरी वो नन्हीं सी कली

अभी तो आयी थी गोदी में
अभी तो पहला कदम चली
अभी तो बोली थी बस ' मम्मी '
अपनी भाषा में तोतली

चुपचाप चली जाती है अब
आँखों में नींद भरे अपनी
दूर वो मुझसे जाते में
अब नहीं मचलती है उतनी

झिलमिल करती आँखें उसकी
उस पर पलकें भी घनी-घनी
ओढ़ दुपट्टा मेरा सर पे
बोली मैं दुल्हन हूँ बनी

आज बनी है खेल-खेल में
कल बनेगी वो दुल्हन असली
यूँ ही एक दिन आ जायेगा
जब वो छोड़ चलेगी मेरी गली

देख नहीं पाउँगी पल-पल
फिर मैं सूरत उसकी ये भली
टोक नहीं पाउँगी उसको
फिर बात-बात पे घड़ी-घड़ी

अब तक जो हर काम को अपने
मुझपर थी निर्भर वो रही
फिर भूल जायेगी माँ को वो
रम कर अपनी दुनिया में कहीं

काश संजो के रख पाती
हर इस पल को अपने पास कहीं
यादों को भर लेती नैनों में
पल-पल जो मुझसे छूट रहीं

भाग रहा है तेज़ गति से
ये वक्त है कि रुकता ही नहीं
ले जायेगा बचपन उसका
मैं रह जाउँगी यहीं कहीं

पीठ पे बस्ता टाँग के अपना…. ॥

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Parul Chaturvedi
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मैं पेशे से इंजीनियर हूँ और शौकिया कवितायेँ लिखती हूँ। मेरा प्रथम कविता संग्रह 'क्षितिज' प्रकाशित हो चूका है। अपने छोटे से योगदान से हिंदी साहित्य जगत में छोटी सी जगह बनाना चाहती हूँ।

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