ब्रजभाषा में घनाक्षरी छंद

maheshjain jyoti

रचनाकार- maheshjain jyoti

विधा- घनाक्षरी

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* श्री कृष्ण जन्म *
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ब्रज वसुधा के कन नित जन-जन मन ,
फूलन में पातन में गूँजै नाम श्याम रे ।
मोहन मुरारी मन मोहत मुरलिया ते ,
गूँजै अधरन जन, साँवरिया नाम रे ।
गलियन-गलियन ठौर-ठौर गामन में ,
लीलाधर लीला रचीं भूमि बनी धाम रे ।
छोड़ क्षीर सागर पधारे हरि यहाँ 'ज्योति',
जेलन में जनमे हैं प्यारे घनश्याम रे ।।1
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टूट गये तारे सब सोय गये रखवारे ,
भादों की अँधेरी रैन घन घिरे घोर रे ।
लै कै वसुदेव चले छबड़ा कूँ सिर धरे ,
कूक रहे आठैं की वा रजनी में मोर रे ।
उफनी हैं यमुना जी शेष नै करी है छाँव,
बोली कहाँ जाऔ छोड़ आँचर कौ छोर रे ।
'ज्योति' लटकाय दिये चरण कमल श्याम,
छिये पाँव यमुना नै चले चितचोर रे ।।2
🦋
छोरा धर छोरी लिये लौटे वासुदेव जेल,
तारे लगे जागे रखवारे भयौ शोर रे ।
आयौ मामा कंस लियौ छीन शिशु देवकी ते ,
नैक न रहम खायौ पाप किये घोर रे ।
पटक सिला पै मारी छिटक गगन गई ,
बोली तेरे पापन कौ आय गयौ छोर रे ।
पैदा भयौ काल कंस गूँजे स्वर देवी माँ के ,
लौटौ खाली हाथ मलै चहकी है भोर रे ।।3
🦋
गोकुल में नंद जी के बाज रही शहनाई,
लाल कूँ निहारै भयौ यशुदा कूँ होस रे ।
रोयौ नंदलाल मचौ शोर चहुँ ओर फिर ,
उरन में भर गयौ जन-जन जोस रे ।
दैंवन बधाई लागे गोकुल की गलियन,
गूँजे चहुँ ओर नंदलाल जयघोष रे ।
थारीहु बजन लागीं लड़ुआ लुटन लागे ,
नंद नैहु खोल दिये दिल-द्वार कोष रे ।।4
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महेश जैन 'ज्योति',
मथुरा ।
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maheshjain jyoti
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"जीवन जैसे ज्योति जले " के भाव को मन में बसाये एक बंजारा सा हूँ जो सत्य की खोज में चला जा रहा है अपने लक्ष्य की ओर , गीत गाते हुए, कविता कहते और छंद की उपासना करते हुए । कविता मेरा जीवन है, गीत मेरी साँसें और छंद मेरी आत्मा । -'ज्योति'

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