” बोलो मेरे यार बुझे क्यूँ रहते हो “

Kavi DrPatel

रचनाकार- Kavi DrPatel

विधा- गज़ल/गीतिका

🌞 सुप्रभात मित्रों 🌞

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बोलो मेरे यार बुझे क्यों रहते हो ।
लाख छुपाओ आँखों से सब कहते हो ।

फूलों के दिल को तुम भी तो भा जाते ।
बनकर के क्यों खार ये नफरत सहते हो ।

माना वो दिल तेरा फिर से तोड़ गया ।
बार बार क्यूँ बांह उसी की गहते हो ।

तुझको फूटी आँख नहीं देखा जिसने ।
उसके आंसू बन करके क्यों बहते हो ।

जब भी तुमसे आस कभी मैंने बांधी ।
आग लगे पुतले के जैसे ढहते हो ।

मोड़ रहा हूँ लहरों को मैं कबसे ही ।
बन करके पतवार जो आओ चहते हो ।

शोला से शबनम बन जाओ मानो भी ।
दहक दहक कर क्यूँ सारा दिन दहते हो ।

सीने में यदि जगह जरा सी मिल जाती ।
सब कहते तुम ताजमहल में रहते हो ।

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🌻 वीर पटेल .🌻

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Kavi DrPatel
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मैं कवि डॉ. वीर पटेल नगर पंचायत ऊगू जनपद उन्नाव (उ.प्र.) स्वतन्त्र लेखन हिंदी कविता ,गीत , दोहे , छंद, मुक्तक ,गजल , द्वारा सामाजिक व ऐतिहासिक भावपूर्ण सृजन से समाज में जन जागरण करना

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