बेवफ़ा है ज़िन्दगी और मौत पर इल्ज़ाम है

Mahesh Kumar Kuldeep

रचनाकार- Mahesh Kumar Kuldeep "Mahi"

विधा- गज़ल/गीतिका

बेवफ़ा है ज़िन्दगी और मौत पर इल्ज़ाम है
मौत तो इस ज़िन्दगी का आखिरी आराम है

लोग जाने क्यों भटकते हैं खुदा की ख़ोज में
खोजिये ग़र माँ के क़दमों के तले हर धाम है

लीजिए पढ़ चाहे गीता बाइबल या फिर क़ुरान
सबमें केवल इक मुहब्बत का लिखा पैगाम है

मंज़िलों का रास्ता मालूम है सबको मगर
डर गया जो मुश्किलों से शख़्स वो नाकाम है

हुक्मरानों के लिये सारी मलाई इक तरफ़
लुट रहा सदियों से केवल आदमी जो आम है

सच से नाता तोड़कर जाते मुसाफ़िर याद रख
झूठ की परवाज़ अच्छी पर बुरा अंजाम है

देख पाता ही नहीं अपनी गलतियाँ आदमी
और सच दिखलाने वाला आइना बदनाम है

हर तरफ़ बदकारियाँ दुश्वारियां इतनी हुई
आदमीयत की हरिक कोशिश हुई नाकाम है

मर चुका ईमान, कठपुतली बने दौलत के सब
दौरे-हाज़िर में हरिक इंसान का इक दाम है

माही

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प्रकाशन साहित्यिक गतिविधियाँ एवं सम्मान – अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं में आपकी गज़ल, कवितायें आदि का प्रकाशन | प्रकाशित साहित्य - गुलदस्त ए ग़ज़ल (साझा काव्य-संग्रह), काव्य सुगंध भाग-3(साझा काव्य-संग्रह),कलाम को सलाम (साझा काव्य-संग्रह), प्रेम काव्य सागर (साझा काव्य-संग्रह), अनुकृति प्रकाशन, बरेली त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुगुंजन’में सतत प्रकाशन |पहला गजल-संग्रह ‘कागज़ पर जिंदगी’ प्रकाशाधीन |

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3 comments
  1. बहुत शानदार ग़ज़ल शानदार भावसंयोजन हर शेर बढ़िया है आपको बहुत बधाई

    नरक की अंतिम जमीं तक गिर चुके हैं आज जो
    नापने को कह रहे , हमसे बह दूरियाँ आकाश की
    मौत के साये में जीती चार पल की जिंदगी
    क्या मदन ये सारी दुनिया, है बिरोधाभास की