*बेटी होती नहीं पराई …*

Neelam Ji

रचनाकार- Neelam Ji

विधा- कविता

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

पाल पोसकर जब की बड़ी ।
कहकर पराई क्यूँ विदा कर दी जाती है ।।

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

जिस घर आँगन बेटी खेली कूदी ।
उस घर आँगन को ना चाहकर भी छोड़ जाती है ।।

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

जिस मायके में जान बसती है बेटी की ।
शादी के बाद उसी मायके में पराई कर दी जाती है ।।

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

आ जाती अनचाही कोई मुशिबत जब बेटी पर ।
कहकर पराए घर की बात ससुराल पर छोड़ दी जाती है ।।

बेटी होती नहीं पराई
पराई कर दी जाती है ।

अहसास अपनेपन का नहीं बदलता बेटी के मन में ।
पर जाने क्यों मायके वालों को बेटी अब पराई सी लगती है ।।

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

जीना चाहती है बेटी फिर से मायके की हर खट्टी मिट्टी याद को ।
पर चाहने से हर मुराद पूरी कहाँ होती है ।।

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

बेटी अब भी जाती है मायके पर अब खुशबू वो नहीं आती ।
जो अपनेपन की खुशबू शादी के पहले आया करती थी ।।

बेटी होती नहीं पराई
पराई कर दी जाती है ।

बिना काम बेटी की याद भी अब किसी को आती नहीं ।
बेटी भी अब बिना वजह जब चाहे मायके जाती नहीं ।।

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

बेटी भी अब मायके के मोह को छोड़ देना चाहती है ।
अपने नन्हे मुन्नों की खूबसूरत दुनिया में डूब जाना चाहती है ।।

बेटी होती नहीं पराई ।
पराई कर दी जाती है ।।

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Neelam Ji
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मकसद है मेरा कुछ कर गुजर जाना । मंजिल मिलेगी कब ये मैंने नहीं जाना ।। तब तक अपने ना सही ... । दुनिया के ही कुछ काम आना ।।

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