बेटी है तो

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विजय कुमार नामदेव

रचनाकार- विजय कुमार नामदेव

विधा- कविता

घर, घर है
गर
घर में बेटी है
बेटी है तो
खेल हैं,खिलौने हैं
मीठी-सी बोली है
ढेर सारे सपने हैं
हँसी है, ठिठोली है
बेटी है तो
गुड्डे हैं, गुड़िया है
रोज इनकी शादी है
बेटी का होना ही
सच्ची आजादी है
बेटी है तो
घर में बहार है
तीज है, त्यौहार है
ढेर सारी खुशियां हैं
रिश्तों में प्यार है
बेटी है तो
जीवन का
हर दिन मधुमास है
बेटी से ही मुझे अपने
पितृत्व का अहसास है
बेटी से ही घर मेरा
घर जैसा बना है
मैं हूँ खुशकिस्मत
मेरी बेटी चेतना है।

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विजय कुमार नामदेव
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सम्प्रति-अध्यापक शासकीय हाई स्कूल खैरुआ प्रकाशित कृतियां- गधा परेशान है, तृप्ति के तिनके, ख्वाब शशि के, मेरी तुम संपर्क- प्रतिभा कॉलोनी गाडरवारा मप्र चलित वार्ता- 09424750038
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