बेटी (शायरी)

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डॉ सुलक्षणा अहलावत

रचनाकार- डॉ सुलक्षणा अहलावत

विधा- शेर

देवालय में बजते शंख की ध्वनि है बेटी,
देवताओं के हवन यज्ञ की अग्नि है बेटी।
खुशनसीब हैं वो जिनके आँगन में है बेटी,
जग की तमाम खुशियों की जननी है बेटी।।

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बड़े नसीब वालों के घर जन्म लेती है बेटी,
घर आँगन को खुशियों से भर देती है बेटी।
बस थोड़ा सा प्यार और दुलार चाहिए इसे,
थोड़ी संभाल में लहलहाए वो खेती है बेटी।।

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फूलों सी कोमल हृदय वाली होती हैं बेटियाँ,
माँ बाप की एक आह पर ही रोती हैं बेटियाँ।
भाई के प्रेम में खुद को भुला देती हैं अक्सर,
फिर भी आज गर्भ में जान खोती हैं बेटियाँ।।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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डॉ सुलक्षणा अहलावत
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लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की खुशबु आये। शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हूँ। हरियाणवी लोक गायक श्री रणबीर सिंह बड़वासनी मेरे गुरु हैं। माँ सरस्वती की दयादृष्टि से लेखन में गहन रूचि है।

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5 comments
  1. बहना अच्छा लिखा है , ज्यादा पढ़ा लिखा तो हूँ नहीं , आप ठहरे डॉक्टर परन्तु मेरे नजरिये से ये शेर तो नहीं था , एक लघु कविता कह सकते हैं

  2. तारीफ़ क्या करूँ,
    क्या कहूँ मैं तुम्हे निर्भया,
    मन पर बोझ,माथे पर कलंक,
    दरिंदगी का लहराता ये परचम,
    क्या लिखूं,किसकी करू मैं निंदा
    वो डूबे राज मद में,कर रहे अब शाही धंध नपुंसक समाज ये बेहया शाही,
    क्या कहूँ,इस कलम को भी कैसे रोकूँ,भूलूँ भी जो खुद को,लेखन धरम मैं कैसे भूलूँ,
    क्या लिखूं किसकी करूँ मैं निंदा,सत्ता नही,न शाही कोई,कलम में वो पुरुषार्थ नही,उन जख्मो को क्या कुरेदुं,
    इस कलम से उसे कैसे भर दूँl
    तारीफ़ क्या करूँ,क्या कहूँ में निर्भया,जो कर सको तो बस माफ़ करो,हम,शर्मिंदा,शर्मिंदा और शर्मिंदा

    ज्यादे पढ़ा लिखा नही हूँ, इसलिए हर जगह यही एक कविता रोता हूँ l

  3. तारीफ़ क्या करूँ,
    क्या कहूँ मैं तुम्हे निर्भया,
    मन पर बोझ,माथे पर कलंक,
    दरिंदगी का लहराता ये परचम,
    क्या लिखूं,किसकी करू मैं निंदा
    वो डूबे राज मद में,कर रहे अब शाही धंध नपुंसक समाज ये बेहया शाही,
    क्या कहूँ,इस कलम को भी कैसे रोकूँ,भूलूँ भी जो खुद को,लेखन धरम मैं कैसे भूलूँ,
    क्या लिखूं किसकी करूँ मैं निंदा,सत्ता नही,न शाही कोई,कलम में वो पुरुषार्थ नही,उन जख्मो को क्या कुरेदुं,
    इस कलम से उसे कैसे भर दूँl
    तारीफ़ क्या करूँ,क्या कहूँ में निर्भया,जो कर सको तो बस माफ़ करो,हम,शर्मिंदा,शर्मिंदा और शर्मिंदा

    ज्यादे पढ़ा लिखा नही हूँ, इसलिए हर जगह यही एक कविता रोता हूँ l