बेटी जो हँस दे तो कुदरत हँसती है।

अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

रचनाकार- अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

विधा- गज़ल/गीतिका

*बेटिया*
सामाजिक बगिया में, गुल सम रहती है।
बेटी जो हँस दे तो, कुदरत हँसती है।

चिंताऐं हर रोज जकड़ लेती मन को।
पल में भोली सूरत हर्षा उठती है।

बाँह पसारे उठ -गिर- उठ चलने लगती।
मन तल पर बचकानी याद उभरती है।

कब उड़ने से रोक सकीं हैं सीमाऐं।
बेटी 'पर' से अंबर सीमित करती है।

किस देवी को पूज रहे दुनिया वाले।
घर में अंबा बेटी बन पग रखती है।

दौलतमंदों से तुम मत कमतर आँको।
सुता संपदा तो किस्मत से मिलती है।

अरे! तंज करने से पहले जग सुन ले।
बेटी तूफानों को चीर निकलती है।
————————————————–
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'
रामपुर कलाँ, सबलगढ़(म.प्र.)

Views 890
Sponsored
Author
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'
Posts 64
Total Views 2.4k
कार्य- अध्ययन (स्नातकोत्तर) पता- रामपुर कलाँ,सबलगढ, जिला- मुरैना(म.प्र.)/ पिनकोड-476229 मो-08827040078
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia