बेटी के भाग्य में प्रभु कांटे ही भर गया.

शालिनी कौशिक

रचनाकार- शालिनी कौशिक

विधा- कविता

पैदा हुई है बेटी खबर माँ-बाप ने सुनी ,
खुशियों का बवंडर पल भर में थम गया .

चाहत थी बेटा आकर इस वंश को बढ़ाये ,
रखवाई का ही काम उल्टा सिर पे पड़ गया .

बेटा जने जो माता ये है पिता का पौरुष ,
बेटी जनम का पत्थर माँ के सिर पे बंध गया .

गर्मी चढ़ी थी आकर घर में सभी सिरों पर ,
बेडा गर्क ही जैसे उनके कुल का हो गया .

गर्दिश के दिन थे आये ऐसे उमड़-घुमड़ कर ,
बेटी का गर्द माँ को गर्दाबाद कर गया .

बैठी है मायके में ले बेटी को है रोती,
झेला जो माँ ने मुझको भी वो सहना पड़ गया .

न मायका है अपना ससुराल भी न अपनी ,
बेटी के भाग्य में प्रभु कांटे ही भर गया .

न करता कदर कोई ,न इच्छा है किसी की ,
बेटी का आना माँ को ही लो महंगा पड़ गया .

सदियाँ गुजर गयी हैं ज़माना बदल गया ,
बेटी का सुख रुढियों की बलि चढ़ गया .

सच्चाई ये जहाँ की देखे है ''शालिनी ''
बेटी न जन्म ले यहाँ कहना ही पड़ गया .
शालिनी कौशिक
[कौशल]

शब्दार्थ-गर्दाबाद-उजाड़ ,विनाश

Sponsored
Views 18
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
शालिनी कौशिक
Posts 2
Total Views 32
पेशे से अधिवक्ता, जागरण-जंक्शन, अमर उजाला, जनवाणी में नियमित रूप से रचनाओं का प्रकाशन, कौशल, कानूनी - ज्ञान आदि कई ब्लॉग्स पर नियमित रूप से रचनाओं का प्रकाशन.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia