बेटी का खत

सत्य प्रकाश

रचनाकार- सत्य प्रकाश

विधा- कविता

मैं तेरे आंगन की तुलसी मेरी आँखें बरस रही
प्यार के मीठे बोलो को मैं तो कब से तरस रही
मां की गोद मिली न मुझको न बाबुल का प्यार मिला
दादी ने खिलाया न ही बेटे सा सत्कार मिला
कहा गई वो थाली जो भैया के वक्त बजाई थी
मेरे होने पर मातम भैया पर गाई बधाई थी
लड़की हो कर जन्म लिया क्या इसमें दोष विधाता का
पाप नहीं हूँ शाप नहीं हूँ कलंक नहीं मैं माता का
धन दौलत ना हार चाहिए बस ये ही उपहार मांगती
मां की गोद में मीठी थपकी और बाबुल का प्यार मांगती
राखी के धागों में लिपटा थोड़ा सा दुलार चाहिये
नन्ही कोपल को खिलने का जीने का अधिकार चाहिए
हस्ती मेरी कुछ नहीं माना एक बेटे के सामने
लेकिन लडकी ही तो आएगी वंश तुम्हारा थामने
हमे कोख में मारने वालों तुम बहु कहां से लाओगे
पेड़ की जड़ काट रहे तुम फल कहा से पाओगे
जीवन की मुस्कान बेटियाँ ईश्वर का वरदान बेटियाँ
पराई नहीं अपनी सी बेटों सी संतान बेटियाँ
बोझ नहीं गम नहीं बेटी बेटे से कम नहीं
बेटी को बचाना है बेटी को पढ़ाना है यही संदेश फैलाना है

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