बेटिया

Dr. Vivek Kumar

रचनाकार- Dr. Vivek Kumar

विधा- कविता

बेटिया समय के साथ
समझने लगती है
इस रहस्य को
क्यों असमय बूढ़े होते जा रहे हैं उसके पिता।
वह जानती है,
उसकी बढ़ती उम्र ही है
पिता के बार्धक्य का असली कारण।

कभी-कभी
मन ही मन कुढ़ती भी है कि
आख़िर वह क्यों
समय से पहले बड़ी हो गई।

पता नहीं कब और कैसे
वह जान जाती है
लगभग सब कुछ कि
उसे क्या-क्या करना है और क्या नहीं,
कब और किसके सामने मुस्कुराना है
और वह भी कितना…

तमाम अनिश्चंतताओं उतार-चढ़ाव के बावजूद
बेटिया रहती है जीवन भर बेखबर
कि बनता है संपूर्ण घर
सिर्फ और सिर्फ उन्हीं से।

वह पूरी लगनशीलता से
संजोती है स्मृतियों के
गुल्लक में गुजरे अच्छे दिनों को ।

बेटियाँ रहती है अपरिचित
इस सच से कि ,
वह है तो घर है
रिश्ते-नाते हैं
तुलसी चौरे पर अनवरत टिमटिमाता दीया है
व्रत-त्योहार है
नेम-धरम है
गुड्डे-गुड़ियाँ और उनकी शादियाँ हैं
सृजन है,
जीवन है।

सचमुच,
बेटियाँ होती है
घर परिवार में रची-बसी
फूलों की सुगंध की तरह
जो दिखाई नहीं देती
लेकिन अपनी उपस्थिति का
सदेैव बोध कराती है।

डॉ. विवेक कुमार
तेली पाड़ा मार्ग, दुमका-814 101

बेहतरीन साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ आपके लिए- यहाँ क्लिक करें

Views 229
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
Dr. Vivek Kumar
Posts 7
Total Views 535
नाम : डॉ0 विवेक कुमार शैक्षणिक योग्यता : एम0 ए0 द्वय हिंदी, अर्थशास्त्र, बी0 एड0 हिंदी, पी-एच0 डी0 हिंदी, पीजीडीआऱडी, एडीसीए, यूजीसी नेट। उपलब्धियाँ : कादम्बिनी, अपूर्व्या, बालहंस, चंपक, गुलशन, काव्य-गंगा, हिंदी विद्यापीठ पत्रिका, जर्जर-कश्ती, खनन भारती, पंजाबी-संस्कृति, विवरण पत्रिका, हिंदुस्तान, प्रभात खबर,राँची एक्सप्रेस, दक्षिण समाचार, मुक्त कथन, वनवासी संदेश, प्रिय प्रभात, आदि पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी केन्द्र, भागलपुर से समय-समय पर रचनाओं का प्रसारण.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia