बेटियां

जगदीश लववंशी

रचनाकार- जगदीश लववंशी

विधा- कविता

मंदिर मस्जिद टेका माथा,
कर मिन्नतें सबको साधा,
तब…..
एक छोटी सी नन्ही कली,
मेरे घर आँगन में खिली,
लाई संग खुशियां हजार,
जीवन में आयी नई बहार,
वो हैं मन की भोली,
मीठी हैं उसकी बोली,
रहती बनकर सुख की छाया,
बेटी नहीं तो कुछ नहीं पाया,
बेटी हैं धरा का आधार,
करती हैं सपने साकार,
फिर क्यों……………..
सुत की चाहत में सुता को मारते,
सुत सुता में इतना अंतर पालते,
जग को निहारने से पहले ही रौंदते,
एक नन्ही कली को खिलने से रोकते,

Views 206
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
जगदीश लववंशी
Posts 65
Total Views 653
J P LOVEWANSHI, MA(HISTORY) & MSC (MATHS) "कविता लिखना और लिखते लिखते उसी में खो जाना , शाम ,सुबह और निशा , चाँद , सूरज और तारे सभी को कविता में ही खोजना तब मन में असीम शांति का अनुभव होता हैं"

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia